हाथरस पुलिस ने एक और अंतरराष्ट्रीय साइबर ठग को गिरफ्तार किया है। यह गिरोह विदेश में नौकरी का झांसा देकर युवक-युवतियों को ठगता था और उन्हें म्यांमार में साइबर अपराध कराने के लिए मजबूर करता था। पुलिस ने एक आरोपी को आज शाम गिरफ्तार किया है, जबकि उसके एक साथी को पिछले सप्ताह पकड़ा गया था। हाथरस के सादाबाद क्षेत्र की राखी और उनके साथी हरीश ने तमिलनाडु के इमानुअल अरसर इंजीनियरिंग कॉलेज, चेन्नई से जीपी रेटिंग कोर्स किया था। वे मर्चेंट नेवी में नौकरी की तलाश में थे। इसी दौरान उन्हें एक विज्ञापन के जरिए संजय राणा नामक व्यक्ति का पता चला, जिसने खुद को ‘मर्लिन मैनेजमेंट एंड एजुकेशन सेंटर’ का निदेशक बताया। संजय ने नौकरी दिलाने के नाम पर दोनों से ऑनलाइन लगभग 6 लाख रुपए ठग लिए। जब पीड़ितों ने नौकरी के लिए दबाव बनाया, तो संजय ने 7 सितंबर को अपने थाईलैंड स्थित सहयोगी सचिन राणा की मदद से उन्हें थाईलैंड भेज दिया। थाईलैंड पहुंचने पर दोनों को एयरपोर्ट से अलग-अलग वाहनों में बैठाकर विभिन्न स्थानों पर ले जाया गया। सचिन राणा ने उन्हें नदी के रास्ते थाईलैंड की सीमा पार कराकर म्यांमार में दाखिल कराया और वहां साइबर अपराधियों को सौंप दिया। म्यांमार में अपराधियों ने दोनों के पासपोर्ट छीन लिए। उन्हें प्रताड़ित किया जाता था, भूखा-प्यासा रखा जाता था और प्रतिदिन 18 घंटे तक साइबर फ्रॉड का काम करने के लिए मजबूर किया जाता था। फौजी वर्दी में गुंडे उन्हें लगातार धमकाते थे। 9 नवंबर को लौटे थे भारत. किसी तरह इन पीड़ितों ने भारतीय दूतावास से संपर्क किया। भारतीय दूतावास में शिकायत के बाद दोनों को वहां से निकालकर थाईलैंड लाया गया। कुछ दिनों तक एक केंद्र में रखने के बाद, भारतीय वायुसेना के विमान से 9 नवंबर को उन्हें भारत भेजा गया। भारत लौटने के बाद हरीश ने आरोपी संजय से अपने पैसे वापस मांगे, लेकिन उसने साफ इनकार कर दिया। इसके बाद पीड़ितों ने 18 नवंबर को साइबर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। हाथरस की साइबर थाना पुलिस ने जांच के बाद मुख्य आरोपी संजय राणा को हिमाचल प्रदेश से गिरफ्तार कर लिया था। म्यांमार की कंपनी में एचआर था आरोपी पुलिस ने इस मामले में दूसरे आरोपी सचिन राणा, निवासी गांव हारसी, तहसील जयसिंहपुर, थाना लम्बा गाँव, जिला कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) को भी गिरफ्तार कर लिया है। पूछताछ में उसने बताया कि वह जुलाई 2025 में म्यांमार की U C कंपनी में एचआर के पद पर भर्ती हुआ था। उसका काम इंस्टाग्राम और फेसबुक पर नौकरी से जुड़े विज्ञापन देना, कॉल सेंटर एक्जिक्यूटिव की वैकेंसी के लिए विज्ञापन जारी करना और पढ़े-लिखे युवाओं को भर्ती करना था। सचिन ने बताया कि कंपनी के लोग ऑनलाइन डेटिंग ऐप्स के जरिए भारत, अमेरिका व अन्य देशों के लोगों को सोशल मीडिया प्लेटफार्म—फेसबुक और इंस्टाग्राम—पर झांसे में लेते थे। पहले चैटिंग के जरिए उनसे भरोसा कायम किया जाता था, फिर कंपनी की रूसी मॉडल उनसे 1–2 बार बात करती थीं। पीड़ितों को यह विश्वास दिलाया जाता था कि कोई सुंदर, अमीर लड़की उनसे बात कर रही है। जब कोई व्यक्ति उनके जाल में फँस जाता था, तो उसके बाद आगे की कार्रवाई शुरू होती थी। ठगी के हिसाब से मिलता था कमीशन सचिन ने बताया कि इसके बाद उन्हें भी लड़की बनकर चैट करनी पड़ती थी। बातचीत के जरिए पीड़ितों से मोटी रकम क्रिप्टोकरेंसी या USDT के रूप में ऐंठ ली जाती थी। कंपनी मालिक का एक महीने का टार्गेट 100 करोड़ रुपये रखा गया था। पाँच लाख तक की ठगी पर कर्मचारियों को 5% कमीशन और इसके अलावा 80 हजार रुपए महीना वेतन मिलता था। सचिन के अनुसार कंपनी में किसी भी व्यक्ति को भर्ती कराने पर उसे 500 डॉलर कमीशन दिया जाता था, जिसमें से 10 हजार रुपए उसे संजय राणा को देने होते थे। उसी के द्वारा सादाबाद के एक युवक और युवती को भर्ती कराया गया था। इसके अलावा उसने एटा के देव, मुंबई की एक लड़की तथा हिमाचल के अखिल और निखिल को नौकरी के नाम पर म्यांमार–थाईलैंड बुलाया था। तीन हजार भारतीय अभी भी फंसे हुए सचिन ने खुलासा किया कि अभी भी म्यांमार के केके पार्क में लगभग तीन हजार भारतीय साइबर स्लेवरी में फंसे हुए हैं। आरोपी डेटिंग ऐप्स के जरिए भारतीय और अमेरिकी नागरिकों को लड़कियों के माध्यम से फंसाकर साइबर ठगी करते थे। इसके अलावा वहां साइबर स्लेव्स को दूसरी कंपनियों को भी बेच दिया जाता था। कुछ कंपनियां पैसों के लेन-देन पर ऐसे गुलाम बनाए गए लोगों को एक-दूसरे को बेचने का काम करती हैं।
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