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पंचवटी में कोविदार के पांच वृक्ष रोपे गए:श्रीराम राज्य के ध्वज चिह्न का प्रतीक, निर्माणाधीन पंचवटी में जलाशय भी आकर्षण

श्रीराम जन्मभूमि परिसर में पंचवटी निर्माण के तहत कोविदार (कचनार) के पांच वृक्ष लगाए गए हैं। यह वृक्ष श्रीराम राज्य के ध्वज चिह्न का प्रतीक माना जाता है। प्रदेश सरकार के उद्यान विभाग की सहायता से इन पौधों को रोपित किया गया है। सुरक्षा के लिए इनके चारों ओर लोहे की जाली भी लगाई गई है। उद्यान विभाग के अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में इस प्रजाति की नर्सरी राज्य की पौधशालाओं में तैयार कर पूरे प्रदेश के पौराणिक स्थलों पर भी रोपण कराया जाएगा। जन्मभूमि परिसर में निर्माणाधीन पंचवटी के मध्य एक सुंदर जलाशय भी तैयार किया जा रहा है। यह तालाब पशु-पक्षियों का क्रीड़ा स्थल बनेगा और परिसर की सुंदरता को भी बढ़ाएगा। जल संरक्षण की दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दस एकड़ में बन रही पंचवटी में पांच वृक्ष बताया गया कि दस एकड़ में बन रही पंचवटी में पांच वृक्ष बरगद, पीपल, अशोक, बेल व आंवला वास्तुशास्त्र के अनुसार अलग-अलग दिशाओं में लगाए गए हैं। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के कोषाध्यक्ष महंत गोविंद देव गिरि ने बताया कि पंचवटी भगवान श्रीराम की स्मृति का उपवन है। वनवास काल में प्रभु श्रीराम ने कुछ समय नासिक स्थित गोदावरी तट पर पंचवटी में बिताया था। वहां आज भी यह स्मृति उपवन विद्यमान है। पंचवटी में पांच वृक्ष होगें शामिल महंत गिरि के अनुसार पंचवटी का अर्थ है पांच वृक्षों का समूह। ये वृक्ष धार्मिक और औषधीय गुणों से परिपूर्ण हैं। पूरब में पीपल, दक्षिण में आंवला, उत्तर में बेल, पश्चिम में बरगद और अग्नि कोण में अशोक लगाने से विशेष सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यता है कि बेल व बरगद में भगवान शिव का वास होता है, पीपल और आंवले में भगवान विष्णु का, जबकि अशोक शोक नाशक और माता सीता की स्मृति से जुड़ा माना जाता है। इन वृक्षों की छाल, पत्तियां और जड़ें औषधियों में उपयोगी हैं। अंगद टीले का जीर्णोद्धार भी अब पूरा हो गया इसी क्रम में श्रीराम जन्मभूमि परिसर में कुबेर नवरत्न टीला और वहां स्थित कुबेरेश्वर महादेव मंदिर का जीर्णोद्धार पहले ही पूरा किया जा चुका है। इस टीले पर जटायुराज की विशालकाय मूर्ति स्थापित की गई है, जो आगंतुकों के लिए सेल्फी प्वाइंट बनी हुई है। वहीं अंगद टीले का जीर्णोद्धार भी अब पूरा हो गया है। अधिग्रहण संबंधी जटिलताओं के कारण लंबे समय से रुका यह कार्य हनुमानगढ़ी अखाड़े द्वारा भूमि का हिस्सा तीर्थ क्षेत्र को रजिस्टर्ड किए जाने के बाद पूरा किया गया। अंगद की स्मृति में टीले पर बड़े आकार में पैर की आकृति को फूल-पत्तियों की क्यारियों से सजाया गया है। साथ ही रामभक्त गिलहरी की प्रतीक मूर्ति भी स्थापित की गई है। नल-नील टीले को भी हरियाली और पुष्पों से संवारा जा रहा है और मिट्टी धंसने से रोकने के लिए विशेष तकनीक अपनाई गई है।


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