सुल्तानपुर में सेवानिवृत्त कर्मचारी एवं पेंशनर्स एसोसिएशन ने शनिवार को कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया। उन्होंने प्रधानमंत्री को संबोधित एक मांग पत्र जिलाधिकारी के माध्यम से सिटी मजिस्ट्रेट को सौंपा। यह प्रदर्शन केंद्रीय आठवें वेतन आयोग के गठन से संबंधित भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के 3 नवंबर के संकल्प पत्र के विरोध में किया गया। इस संकल्प पत्र में पेंशनरों की पेंशन और अन्य लाभों के पुनरीक्षण का संदर्भ शामिल नहीं है। पेंशनरों का कहना है कि वेतन आयोगों के इतिहास में यह पहली बार है कि आयोग की अनुशंसाओं को लागू करने की तिथि से पहले सेवानिवृत्त कर्मचारियों के पेंशन पुनरीक्षण को वेतन आयोग के दायरे से बाहर रखा गया है। उन्होंने बताया कि सातवें वेतन आयोग के 28 फरवरी 2014 के संकल्प पत्र के पैरा (च) में पेंशन के पुनरीक्षण और अन्य लाभों को स्पष्ट रूप से वेतन आयोग के दायरे में शामिल किया गया था। आठवें वेतन आयोग के 3 नवंबर 2025 के संकल्प में, आयोग की रिपोर्ट लागू होने की तिथि से पहले के पेंशनरों के पेंशन पुनरीक्षण और अन्य लाभों का विषय छोड़ दिया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कर्मचारियों के वेतन भत्ते के पुनरीक्षण के साथ पेंशनरों की पेंशन का पुनरीक्षण नहीं किया जाएगा। पेंशनरों ने उच्चतम न्यायालय के 17 दिसंबर 1982 के एक निर्णय का हवाला दिया। इस निर्णय में मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पूर्णपीठ ने स्पष्ट किया था कि कर्मचारियों को दी जाने वाली पेंशन सरकार का दान या कृपा नहीं, बल्कि लंबी सेवाओं का प्रतिफल है। न्यायालय ने इसे ‘लंबित वेतन’ (Deferred Pay) माना था। एसोसिएशन ने सरकार से इस मामले पर संज्ञान लेने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि इस निर्णय से देश के करोड़ों बुजुर्गों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। उत्तर प्रदेश के लगभग 13 लाख पेंशनर भी इस आगामी बदलाव से चिंतित हैं।
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