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ATS ने जिसे आरोपी कहा, हाईकोर्ट ने जमानत दी:रोहिंग्या-बांग्लादेशियों के फर्जी आधार बनाता था, लखनऊ HC ने कहा- देशद्रोही नहीं

फर्जी दस्तावेजों के जरिए रोहिंग्या-बांग्लादेशियों के आधार कार्ड बनाने के गंभीर आरोपों में फंसे सलमान अंसारी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने माना कि उसके ऊपर देशद्रोह की धारा जिस आधार पर लगाई गई, वह प्रथम दृष्टया केस डायरी में है ही नहीं। उससे इससे जुड़ा कोई साक्ष्य भी बरामद नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने सह आरोपी के समान भूमिका (पैरिटी) को ध्यान में रखते हुए जमानत मंजूर कर दी। आरोपी ने डलवाई थी जमानत याचिका यह मामला एटीएस थाना गोमतीनगर लखनऊ में दर्ज किया गया था। सलमान अंसारी पर भारतीय नागरिकों के अलावा बांग्लादेशी, रोहिंग्या, पाकिस्तानी और नेपाली नागरिकों के लिए कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर आधार कार्ड तैयार और संशोधित करने का आरोप है, जिनका इस्तेमाल आगे पासपोर्ट समेत सरकारी सुविधाएं लेने में किया जाना बताया गया। अधिवक्ता मोहित शर्मा ने बताया कि धारा 152 बीएनएस देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप से जुड़ी है, लेकिन कोर्ट ने अपनी स्पष्ट टिप्पणी में कहा कि प्रथम दृष्टया इस धारा का अपराध बनता हुआ नहीं दिखता। इसी महत्वपूर्ण बिंदु को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने जमानत मंजूर की। किन धाराओं में दर्ज था मुकदमा एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152, 318(4), 336, 337, 340 और 61(2) लगाई गई थी। इनमें धारा 152 को देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे से जुड़ा गंभीर अपराध माना जाता है। बचाव पक्ष की दलील: धारा 152 लागू नहीं होती अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता मोहित शर्मा समेत अन्य वकीलों ने कोर्ट को बताया कि बरामदगी मेमो के अवलोकन से स्पष्ट है कि सलमान अंसारी से जो सामान बरामद हुआ। जिसमें लैपटॉप, स्कैनर, हार्ड डिस्क, मोबाइल, बैंक कार्ड, आधार कार्ड और अन्य उपकरण शामिल हैं। उससे धारा 152 बीएनएस का अपराध प्रथम दृष्टया नहीं बनता। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि शेष धाराओं में अधिकतम सजा सात वर्ष तक है और अभियुक्त का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। सह-आरोपी को मिल चुकी है जमानत बचाव पक्ष ने कोर्ट का ध्यान सह-आरोपी हिमांशु राय की ओर भी दिलाया, जिसे इसी कोर्ट ने समान भूमिका के आधार पर 3 नवंबर 2025 को जमानत दे दी थी। इसी आधार पर सलमान अंसारी के लिए भी पैरिटी का दावा किया गया। राज्य की ओर से अपर सरकारी अधिवक्ता (AGA) ने जमानत का विरोध किया और कहा कि अभियुक्त के अन्य आरोपियों से वित्तीय लेनदेन सामने आए हैं। हालांकि, सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष भी धारा 152 बीएनएस के तहत अपराध को प्रथम दृष्टया साबित करने वाली कोई ठोस सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं दिखा सका। कोर्ट की अहम टिप्पणी न्यायमूर्ति करुणेश सिंह पवार ने कहा कि रिकॉर्ड के अवलोकन से ऐसा नहीं प्रतीत होता कि धारा 152 बीएनएस के आवश्यक तत्व इस मामले में बनते हों। अभियुक्त 12 जून 2025 से जेल में है, जांच अभी जारी है और सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है। ऐसे में पैरिटी के आधार पर सलमान अंसारी को भी जमानत दिया जाना न्यायसंगत है। शर्तों के साथ जमानत मंजूर कोर्ट ने सलमान अंसारी को निजी मुचलका और दो जमानतदार पेश करने पर रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही यह शर्त लगाई कि वह बिना ट्रायल कोर्ट की अनुमति के जिला नहीं छोड़ेगा, न तो साक्ष्यों से छेड़छाड़ करेगा और न ही गवाहों को प्रभावित करेगा। उसे हर तारीख पर ट्रायल कोर्ट में उपस्थित रहना अनिवार्य होगा।


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