गोरखपुर की बिजली व्यवस्था से जुड़े संविदा कर्मियों की बड़े पैमाने पर छटनी को लेकर हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने आरोप लगाया है कि निजीकरण की तैयारी के तहत तय मानकों को दरकिनार कर लगभग 45 प्रतिशत संविदा कर्मियों को हटाया जा रहा है, जिससे प्रदेश भर में असंतोष और विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। संघर्ष समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि संविदा कर्मियों को हटाने की प्रक्रिया अक्टूबर 2024 से ही शुरू कर दी गई थी, जबकि पावर कार्पोरेशन प्रबंधन ने नवंबर 2024 में पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण के निर्णय को सार्वजनिक किया। समिति का आरोप है कि निजीकरण की औपचारिक घोषणा से पहले ही जमीनी स्तर पर कर्मचारियों को हटाने की कार्रवाई शुरू हो चुकी थी। 25 हजार से अधिक संविदा कर्मी बाहर संघर्ष समिति के अनुसार अब तक करीब 25 हजार संविदा कर्मियों की सेवाएं समाप्त की जा चुकी हैं। इनमें ऐसे कर्मी भी शामिल हैं, जो वर्षों तक बिजली व्यवस्था के संचालन के दौरान दुर्घटनाओं का शिकार होकर शारीरिक रूप से अक्षम हो चुके हैं। समिति ने इसे अमानवीय करार दिया है। तय मानकों से कम की जा रही तैनाती समिति ने बताया कि मई 2017 में पावर कार्पोरेशन प्रबंधन ने संविदा कर्मियों की तैनाती के स्पष्ट मानक तय किए थे। इसके तहत शहरी क्षेत्र के एक विद्युत उपकेंद्र पर 36 और ग्रामीण क्षेत्र में 20 संविदा कर्मियों की तैनाती अनिवार्य थी। लेकिन अब बिना किसी नए आदेश के जारी किए जा रहे टेंडरों में शहरी क्षेत्र में 18.5 और ग्रामीण क्षेत्र में 12.5 कर्मियों की ही व्यवस्था की जा रही है, जिससे करीब 45 प्रतिशत कर्मियों की छटनी हो रही है। बिजली व्यवस्था पर पड़ सकता है असर संघर्ष समिति का कहना है कि वर्षों का अनुभव रखने वाले कम वेतनभोगी संविदा कर्मियों को हटाने से न सिर्फ कर्मचारियों का भविष्य संकट में है, बल्कि प्रदेश की बिजली व्यवस्था भी लड़खड़ा सकती है। समिति ने स्पष्ट किया कि यदि आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी पावर कार्पोरेशन प्रबंधन और चेयरमैन की होगी।
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