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हाईकोर्ट ने 100 साल के आरोपी को बरी किया:बुढ़ापे में मिला न्याय : 1982 के मर्डर केस में कोर्ट ने कहा- जवाबदेही का तंत्र नहीं अपने आप में सज़ा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1982 के मर्डर केस में 100 साल के एक व्यक्ति को सजा से बरी किया। कोर्ट ने यह बरी केस की खूबियों के आधार पर किया गया, खासकर अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। हाईकोर्ट जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने अपने लम्बे फैसले में आरोपी की उम्र के बारे में कुछ ज़रूरी बातें कही है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब कोई व्यक्ति जीवन के आखिरी पड़ाव पर कोर्ट के सामने खड़ा होता है तो दशकों की प्रक्रियात्मक देरी के बाद दंडात्मक परिणामों पर ज़ोर देना न्याय को एक ऐसे अनुष्ठान में बदलने का जोखिम पैदा करता है जो अपने मूल उद्देश्य से अलग हो जाता है। कोर्ट ने आगे कहा कि जब सिस्टम खुद ही उचित समय के भीतर अंतिम फैसला देने में असमर्थ रहा है तो राहत देते समय कोर्ट एक संतुलित, मानवीय दृष्टिकोण अपनाने में सही हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि न्याय अब क्या चाहता है, इसका आकलन करते समय दशकों से आरोपी द्वारा झेली गई चिंता, अनिश्चितता और सामाजिक परिणामों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। मामले के अनुसार अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि 9 अगस्त, 1982 को शिकायतकर्ता और उसका भाई (मृतक) घर लौट रहे थे, जब वे मैकू से मिले, जिसके पास बंदूक थी, सत्ती दीन, जिसके पास भाला/बल्लम था और अपीलकर्ता-धानी राम, जिसके पास कुल्हाड़ी/फरसा था। कथित तौर पर सत्ती दीन और धानी राम (अपीलकर्ता) ने मैकू को गुनुआ को मारने के लिए उकसाया, क्योंकि उसने एक बार उसकी पिस्तौल ज़ब्त करवा दी थी और उसकी छह बीघा ज़मीन भी ले ली थी। पुरानी दुश्मनी के कारण मैकू ने उस पर गोली चला दी। गोली मृतक की पीठ में लगी, जिससे वह गिर गया और मर गया। गोली चलने की आवाज़ सुनकर 4 लोग घटना स्थल की ओर दौड़े और बीच-बचाव करने की कोशिश की। हालांकि, आरोपी भाग गए। जुलाई, 1984 में एडिशनल सेशन जज, हमीरपुर ने सत्ती दीन और धानी राम को धारा 302 के साथ धारा 34 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया और उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई। मुख्य आरोपी, मैकू, फरार हो गया। सत्ती दिन की अपील के दौरान ही मौत हो गई। इस तरह हाईकोर्ट के सामने सिर्फ़ धनी राम ही अकेले जीवित अपीलकर्ता बचे। हाईकोर्ट में कहा गया कि अपीलकर्ता की उम्र लगभग 100 साल है और उसे सिर्फ़ उकसाने का रोल दिया गया। यह कहा गया कि मुख्य आरोपी, यानी मैकू, जिसने कथित तौर पर मृतक को गोली मारी थी, उसे पुलिस ने कभी गिरफ्तार नहीं किया। दूसरी ओर शासकीय अधिवक्ता ने आपराधिक अपील का विरोध किया। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि आरोपी-अपीलकर्ता अब 100 साल का है। हाईकोर्ट की टिप्पणियां मामले और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों का विश्लेषण करने के बाद हाईकोर्ट ने दो मुख्य गवाहों की गवाही और अन्य दस्तावेजी सबूतों को निम्न कारणों से मूल रूप से अविश्वसनीय पाया: (i) घटना की शुरुआत में विरोधाभास। (ii) चश्मदीद गवाह के तौर पर अनुचित व्यवहार। (iii) प्राथमिकी में कमी। (iv) स्वाभाविक रूप से असंभव बातें। बेंच ने आंखों देखे और मेडिकल सबूतों के बीच एक महत्वपूर्ण विसंगति की ओर भी इशारा किया। कोर्ट ने कहा कि जबकि प्रॉसिक्यूशन के गवाहों ने दावा किया कि गोली लगने के बाद मृतक ज़मीन पर गिर गया, और सत्ती दीन ने फिर उसके सीने में भाला घोंप दिया, वहीं पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट में चोट नंबर 5 को “आगे से पीछे और थोड़ा ऊपर” की दिशा वाला एक पंक्चर घाव बताया गया। कोर्ट ने कहा कि अगर मृतक ज़मीन पर सीधा लेटा हुआ था, तो ऐसी ऊपर की ओर जाने वाली दिशा कानूनी और वैज्ञानिक रूप से असंभव थी। इसके अलावा, कोर्ट ने खुद प्राथमिकी पर भी शक किया। बेंच ने कहा कि जबकि शिकायतकर्ता ने माना कि उसके अंगूठे के निशान की स्याही ‘रॉयल ​​ब्लू’ थी, मुकदमा असल में ‘ब्लू-ब्लैक’ स्याही से लिखी गई। इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्राथमिकी शायद जांच अधिकारी के आने के बाद सोच-समझकर तैयार की गई होगी। हाईकोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि जबकि अपीलकर्ता-धानी राम पर कुल्हाड़ी (फरसा) से लैस होने का आरोप था, मेडिकल रिपोर्ट में ऐसे हथियार से लगी कोई चोट नहीं दिखाई गई। इस तरह यह मानते हुए कि घटना की शुरुआत और तरीका संदिग्ध है और प्रॉसिक्यूशन ने घटना की असलियत को छिपाया, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता को संदेह का लाभ मिलना चाहिए। हालांकि बरी सबूतों के आधार पर किया गया, कोर्ट ने यह भी कहा कि धानी राम अब लगभग 100 साल के हैं, जिन्होंने पेंडिंग अपील के साये में बेल पर लगभग 40 साल बिता दिया है। बेंच के लिए लिखते हुए जस्टिस चंद्र धारी सिंह ने कहा: “न्याय कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जो इंसानी हालात से अलग हो। कानून इस सच्चाई से अनजान नहीं हो सकता कि बढ़ती उम्र अपने साथ शारीरिक कमज़ोरी, निर्भरता और जीवन के सीमित होते दायरे को लाती है।” कोर्ट ने ज़ोर दिया कि इतनी बड़ी देरी सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं है। यह निष्पक्षता को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बन जाता है। बेंच ने कहा , “एक आपराधिक प्रक्रिया जो पीढ़ियों तक चलती है, वह सिर्फ जवाबदेही का एक तंत्र नहीं रह जाती और अपने आप में सज़ा का रूप ले लेती है।” हाईकोर्ट ने सज़ा रद्द की और अपील स्वीकार कर ली और अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया है।


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