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स्मार्ट सिटी के नाम पर 6 करोड़ की बर्बादी:तांगा स्टैंड पर बनी सुपर मार्केट बनी सफेद हाथी, 3 साल से पड़ा खाली

बरेली जंक्शन के पास कभी तांगों की खट-खट सुनाई देती थी, लेकिन स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत नगर निगम ने इस जमीन का कायाकल्प करने का फैसला किया। करीब 6 करोड़ की भारी-भरकम लागत से यहां एक आलीशान सुपर मार्केट खड़ा कर दिया गया। उम्मीद थी कि जंक्शन के पास होने के कारण यह व्यापार का बड़ा केंद्र बनेगा, लेकिन हकीकत इसके उलट है। आज 3 साल बीत जाने के बाद भी यह इमारत धूल फांक रही है। चमचमाती टाइल्स और आधुनिक स्ट्रक्चर अब सरकारी लापरवाही की गवाही दे रहे हैं। 35 लाख का टेंडर बना गले की फांस
इस सुपर मार्केट के शुरू न हो पाने के पीछे की सबसे बड़ी वजह इसका टेंडर बताया जा रहा है। नगर निगम ने इसके साल भर का टेंडर करीब 35 लाख रुपए रखा है। मार्केट में लगभग 35 दुकानें हैं, लेकिन इतनी ऊंची कीमत सुनकर व्यापारी पास फटकने को तैयार नहीं हैं। सवाल यह उठता है कि क्या प्रोजेक्ट बनाने से पहले इसकी आर्थिक व्यवहार्यता (Economic Viability) की जांच नहीं की गई थी? बिना किसी मार्केट सर्वे के करोड़ों रुपए जनता की गाढ़ी कमाई के पानी में बहा दिए गए। अब देखे इस सुपर मार्केट की 5 तस्वीरें ….. नगर आयुक्त की लाचारी और खाली खजाना
नगर आयुक्त संजीव कुमार मौर्य का कहना है कि प्रशासन लगातार टेंडर निकाल रहा है, लेकिन कोई भी इस मार्केट को लेने के लिए आगे नहीं आ रहा है। अधिकारियों के पास इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं है कि जब कोई खरीदार या किरायेदार मिल ही नहीं रहा, तो इतनी महंगी योजना को अंजाम क्यों दिया गया? यह सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता है, जहां कागजों पर तो योजनाएं सुपरहिट हैं, लेकिन जमीन पर वे पूरी तरह फ्लॉप साबित हो रही हैं। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की जुगलबंदी ने डुबोया पैसा
इस पूरे प्रकरण में जिले के पूर्व में रहे बड़े अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की भूमिका संदिग्ध नजर आती है। जब प्रोजेक्ट का खाका तैयार हुआ, तब किसी ने यह नहीं सोचा कि शहर की भौगोलिक स्थिति और व्यापारिक क्षमता के हिसाब से यह निवेश सही है या नहीं। कमिश्नर स्तर पर होने वाली बैठकों में भी शायद सिर्फ फाइलों को हरी झंडी दी गई, प्रोजेक्ट के भविष्य पर मंथन नहीं हुआ। स्मार्ट सिटी के बजट को ठिकाने लगाने की जल्दबाजी में बरेली के विकास के नाम पर यह खिलवाड़ किया गया है। रखरखाव के अभाव में जर्जर हो रही करोड़ों की बिल्डिंग
पिछले 3 सालों से बंद पड़ी इस बिल्डिंग की हालत अब धीरे-धीरे खराब होने लगी है। शीशों पर धूल की परत जमी है और परिसर में लावारिस पशुओं का डेरा रहने लगा है। अगर इसे जल्द शुरू नहीं किया गया, तो मेंटेनेंस के नाम पर नगर निगम को करोड़ों का अतिरिक्त चूना लगेगा। शहर के प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि यह “बिना प्लानिंग के विकास” का सबसे सटीक उदाहरण है। जंक्शन के पास जाम की समस्या सुलझाने के बजाय, एक ऐसी बिल्डिंग खड़ी कर दी गई जो अब खुद प्रशासन के लिए सिरदर्द बन चुकी है। क्या अब कम होंगे दाम या बना रहेगा गतिरोध?
अब देखना यह होगा कि क्या नगर निगम अपनी गलती सुधारते हुए टेंडर की शर्तों और कीमतों में बदलाव करता है, या फिर यह सुपर मार्केट ऐसे ही खंडहर में तब्दील होता रहेगा। अगर समय रहते कमिश्नर और नगर आयुक्त ने कोई कड़ा फैसला नहीं लिया, तो स्मार्ट सिटी मिशन के तहत बरेली को मिला यह ‘तोहफा’ इतिहास के पन्नों में भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ा हुआ माना जाएगा। सफेद हाथी बनी मार्केट पर जवाबदेही तय हो, जनता पूछ रही ये 5 कड़े सवाल पूर्व कमिश्नर और स्मार्ट सिटी के बोर्ड से सवाल
जब इस प्रोजेक्ट का प्रस्ताव बोर्ड मीटिंग में रखा गया था, तब तत्कालीन कमिश्नर ने इसकी आर्थिक व्यवहार्यता (Financial Viability) की जांच क्यों नहीं की? क्या अफसरों का काम सिर्फ बजट पास करना है, यह देखना नहीं कि उस निवेश से शहर को क्या हासिल होगा? क्या उस समय के अधिकारियों ने केवल कागजी आंकड़ों को देखकर 6 करोड़ की मंजूरी दे दी थी? तत्कालीन और वर्तमान नगर आयुक्त से सवाल
नगर निगम के पास क्या इस बात का कोई डेटा है कि 35 दुकानों वाली मार्केट का टेंडर 35 लाख रुपये किस आधार पर तय किया गया? स्मार्ट सिटी के अधिकारी ये बताएं कि क्या टेंडर की शर्तें इतनी कठिन जानबूझकर रखी गई हैं ताकि कोई स्थानीय छोटा व्यापारी इसमें शामिल ही न हो सके? 3 साल से बंद पड़ी बिल्डिंग के रखरखाव पर जो पैसा खर्च हो रहा है, उसकी भरपाई किसकी सैलरी से की जाएगी? शहर के विधायक और जनप्रतिनिधियों से सवाल
बरेली के सांसद, विधायक और अन्य माननीयों ने इस प्रोजेक्ट के शिलान्यास और उद्घाटन के वक्त बड़ी-बड़ी बातें की थीं। अब जब यह प्रोजेक्ट शहर के गले की हड्डी बन गया है, तो वे चुप क्यों हैं? क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी सिर्फ पत्थर लगवाने तक सीमित है? उन्होंने सदन में इस बर्बादी के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाई? मेयर और नगर निगम की कार्यकारिणी से सवाल
मेयर साहब, आप शहर के प्रथम नागरिक हैं। आपकी नाक के नीचे 6 करोड़ रुपये की बिल्डिंग खंडहर में तब्दील हो रही है और नगर निगम का खजाना खाली है। क्या कार्यकारिणी ने कभी इस मार्केट की कीमतों को कम करके इसे चालू करने का प्रस्ताव रखा? व्यापारियों और निगम के बीच इस गतिरोध को तोड़ने के लिए आपने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं? प्लानिंग विभाग के इंजीनियरों से सवाल
स्मार्ट सिटी के उन ‘स्मार्ट’ इंजीनियरों से भी सवाल होना चाहिए जिन्होंने जंक्शन जैसी भीड़भाड़ वाली जगह पर बिना प्रॉपर एक्सेस के इतना बड़ा कमर्शियल कॉम्प्लेक्स प्लान कर दिया। क्या यह सिर्फ बजट खपाने का एक जरिया था? बिना प्लानिंग के किए गए इस निर्माण के लिए दोषी अधिकारियों पर रिकवरी की कार्यवाही क्यों नहीं होनी चाहिए? स्मार्ट सिटी के प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी एक विशेष कंपनी यानी Bareilly Smart City Limited (BSCL) के पास होती है। इसकी कमेटी (Board of Directors) में प्रशासन के सबसे बड़े अधिकारी और शासन के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। यहाँ वर्तमान कमेटी की सूची दी गई है, जिनसे 6 करोड़ की बर्बादी पर सवाल पूछा जाना चाहिए: स्मार्ट सिटी बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स (मुख्य जिम्मेदार)
चेयरमैन: भूपेंद्र एस. चौधरी (मंडलायुक्त/कमिश्नर, बरेली) – बोर्ड के मुखिया होने के नाते हर बड़े प्रोजेक्ट की अंतिम मंजूरी इन्हीं के स्तर से होती है।
CEO और डायरेक्टर: संजीव कुमार मौर्य (नगर आयुक्त, बरेली) – प्रोजेक्ट को लागू करने और टेंडर निकालने की सीधी जिम्मेदारी इनकी है।
डायरेक्टर: अविनाश सिंह (जिलाधिकारी/DM, बरेली) – जिले के मुखिया के तौर पर कमेटी के महत्वपूर्ण सदस्य।
डायरेक्टर: मणिकांदन ए. (उपाध्यक्ष, बरेली विकास प्राधिकरण – BDA) – शहर की प्लानिंग और कमर्शियल प्रोजेक्ट्स में इनकी तकनीकी राय शामिल होती है।
स्वतंत्र डायरेक्टर: वंदना चानना और पी.के. राव – ये बाहरी विशेषज्ञ के तौर पर बोर्ड में शामिल हैं ताकि प्रोजेक्ट की गुणवत्ता और उपयोगिता सुनिश्चित हो सके। स्मार्ट सिटी एडवाइजरी फोरम (सलाहकार समिति)
इस फोरम में शहर के जनप्रतिनिधि शामिल होते हैं, जिनका काम जनता के पैसे का सही उपयोग सुनिश्चित करना है:
मेयर : डॉ उमेश गौतम चेयरमैन – नगर निगम के प्रमुख होने के नाते इनका दायित्व है कि निगम की जमीन पर बने प्रोजेक्ट सफल हों।
सांसद (MP): छत्रपाल सिंह गंगवार – भारत सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर स्मार्ट सिटी फंड की निगरानी।
विधायक (MLA): अरुण कुमार (शहर विधायक) और संजीव अग्रवाल (कैंट विधायक) – इनके क्षेत्रों में होने वाले विकास कार्यों की सफलता की जिम्मेदारी इन्हीं की है। इन अधिकारियों से भी होनी चाहिए पूछताछ
बोर्ड में इनके अलावा शासन (लखनऊ) के भी प्रतिनिधि होते हैं:
डॉ. अलका सिंह (संयुक्त निदेशक, RCUES लखनऊ)
अरुण प्रकाश (विशेष सचिव, नगर विकास विभाग और निदेशक स्मार्ट सिटी मिशन)
शमीम अख्तर (मुख्य अभियंता, यूपी जल निगम)
अजय कुमार (मुख्य अभियंता, PWD बरेली)


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