इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र से मकान गिराने की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट के “ बुलडोज़र जस्टिस” फैसले के बाद भी राज्य में दंड के तौर पर मकान तोड़े जा रहे हैं, जो चिंता का विषय है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने सवाल उठाया कि क्या किसी अपराध के तुरंत बाद मकान गिरा देना सरकार की शक्ति का गलत इस्तेमाल नहीं है। अदालत ने कहा कि उसके सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जहां एफआईआर दर्ज होते ही पहले नोटिस दिए गए और बाद में घरों को गिरा दिया गया। अदालत ने कहा कि यह मामला सिर्फ सरकार के अधिकार का नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों (अनुच्छेद 14 और 21) से भी जुड़ा है। इसलिए कोर्ट ने कुछ अहम सवाल तय किए। हाईकोर्ट ने कहा कि 1. क्या सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2024 के निर्णय—विशेषकर उसके पैरा 85 और 86—का अनुपालन नहीं हो रहा है ? 2. क्या ढांचा गिराने का अधिकार अपने-आप में ध्वस्तीकरण को उचित ठहराता है। 3. क्या अपराध के तुरंत बाद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई कार्यपालिका के विवेक का दुरूपयोग है ? 4. हाईकोर्ट राज्य के वैधानिक अधिकार और नागरिक के अनुच्छेद 21 व 14 के मौलिक अधिकारों के बीच टकराव को कैसे संतुलित करे ? 5. क्या ध्वस्तीकरण की “उचित आशंका” किसी नागरिक के लिए इस अदालत का दरवाज़ा खटखटाने का कारण बन सकती है; और यदि हां, तो ऐसी आशंका स्थापित करने के लिए न्यूनतम मानक क्या होगा? यह मामला 9 फरवरी को हाईकोर्ट में फिर सुना जाएगा। यह मामला हमीरपुर के कुछ लोगों की याचिका से जुड़ा है। उनका कहना है कि उनके एक रिश्तेदार पर गंभीर अपराधों का केस दर्ज है, लेकिन वे खुद आरोपी नहीं हैं। फिर भी उन्हें डर है कि उनका घर, लॉज और आरा मिल तोड़े जा सकते हैं। उनका आरोप है कि उनकी कुछ संपत्तियां पहले ही सील कर दी गई हैं। राज्य सरकार ने कहा कि याचिका जल्दबाजी में दाखिल की गई है और लोगों को पहले नोटिस का जवाब देना चाहिए। सरकार ने यह भी भरोसा दिलाया कि कानूनी प्रक्रिया के बिना कोई मकान नहीं तोड़ा जाएगा। लेकिन कोर्ट ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, तो इन सवालों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है।
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