संभल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष पर एक विराट हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस अवसर पर महामंडलेश्वर भैया दास महाराज ने ‘हिंदू’ शब्द का अर्थ समझाया और मनुस्मृति पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं, जिसे बड़ी संख्या में लोगों ने देखा। महामंडलेश्वर भैया दास महाराज ने अपने संबोधन में ‘हिंदू’ शब्द की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने कहा, ‘जो सबको देने वाला हो और सबको स्वीकार करने वाला हो, उसे हिंदू कहते हैं।’ उन्होंने वहां मौजूद मुस्लिम समुदाय के लोगों से भी ‘देने वाला’ बनने का आग्रह किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू किसी विशेष संप्रदाय का नाम नहीं है। उनके अनुसार, जिसकी आदत देने की, सहन करने की, दया करने की, प्रेम बांटने की, दीन-दुखियों, माता-पिता, पड़ोसियों और गौ माता की सेवा करने की हो, वही सच्चा हिंदू है। उन्होंने कहा कि सच्चा हिंदू बनने में कोई दोष नहीं है। महामंडलेश्वर ने आगे कहा कि इस धरा पर जितने भी धर्मात्मा राजा हुए हैं, सभी ने सबको अपनाया है। उन्होंने भारत भूमि को ‘भारत माता’ कहे जाने का कारण बताते हुए कहा कि यह भूमि सबको देने वाली और सबको अपनाने वाली है, जबकि अन्य देशों को इस तरह संबोधित नहीं किया जाता। महामंडलेश्वर ने छुआछूत की अवधारणा को खारिज करते हुए कहा कि यदि यह प्रथा होती तो रविदास जी को दीक्षा नहीं दी जाती। उन्होंने दावा किया कि मनुस्मृति के ज्ञान के कारण ही वाल्मीकि और रविदास जैसे संत भगवान तुल्य माने गए। उन्होंने मनुस्मृति का हवाला देते हुए कहा कि इसमें जाति-पांति का उल्लेख नहीं है, बल्कि केवल चार वर्णों का वर्णन है। महामंडलेश्वर के अनुसार, वर्ण का निर्धारण जन्म से नहीं, बल्कि कर्मों से होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय या शूद्र नहीं होता, बल्कि अपने कर्मों के आधार पर इन वर्णों में आता है। महामंडलेश्वर ने वाल्मीकि जी का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके कर्म ब्राह्मणों जैसे थे और उन्होंने ब्रह्मत्व को धारण किया। इसी कारण उन्हें सभी ने भगवान माना। उन्होंने जोर देकर कहा कि ब्राह्मणों और ज्ञानवान लोगों ने ही उन्हें भगवान का दर्जा दिया, और क्षत्रियों ने भी उनका सम्मान किया। उन्होंने बताया कि भगवान राम स्वयं वाल्मीकि जी के चरणों में नतमस्तक हुए थे। जब सीता जी पहली बार वनवास गईं, तब भी वे वाल्मीकि आश्रम में ही रुकी थीं। लंका विजय के बाद अवध में कुछ समय बिताने के बाद जब सीता जी दोबारा वनवास गईं, तो लक्ष्मण जी उन्हें वाल्मीकि आश्रम में ही छोड़कर आए थे। महामंडलेश्वर ने कहा कि यह वाल्मीकि जी पर उनके गहरे विश्वास को दर्शाता है, और समाज ने उन्हें भी भगवान के रूप में स्वीकारा है। प्रांत संगठन मंत्री अरुण ने कार्यक्रम में आए लोगों को संबोधित करते हुए हिंदू एकता पर जोर दिया और कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों को हिंदू संस्कृति से जोड़ने का आह्वान किया। कार्यक्रम में कमल कौशल वार्ष्णेय, नीरज रस्तोगी, कुलदीप ऐरन, संजय गुप्ता पोली, मुकुल रस्तोगी, विष्णुशरण रस्तोगी, अशोक गर्ग, विनय कुमार गुप्ता, परीक्षित मोंगिया, अनुराग गुप्ता, राजीव गुप्ता, राजुल गुप्ता, हितेश मिश्रा, मनीष रस्तोगी, मनोज गुप्ता, शशांक शर्मा, अंकित त्यागी, प्रियांशु जैन एडवोकेट, सभासद गगन वार्ष्णेय, राजेंद्र पाल, रोहित गुप्ता रोमी, प्रवीण वर्मा गुल्लू हरीश रस्तोगी योगेश मदन योगेंद्र शर्मा आदि मौजूद रहे।
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