समाजवादी पार्टी यूपी की सियासत में एक बार फिर बड़ा दांव खेलने की तैयारी में है। उसका फोकस दलित वोटों को अपनी ओर करने का है। इसके लिए विधानसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर सामान्य सीटों पर भी दलित बिरादरी से आने वाले नेता को अपना उम्मीदवार बना सकती है। इसके पीछे की रणनीति क्या है? क्या इसके लिए कोई सर्वे कराया जा रहा? किन सामान्य सीटों पर दलित जाति के प्रत्याशी को टिकट दिया जा सकता है? किस जाति के लोगों के टिकट काटकर सपा दलितों को टिकट देगी? 2024 में क्या समीकरण अपनाया था? इन सवालों के जवाब इस खबर में तलाशेंगे… सबसे पहले जानिए इस रणनीति के पीछे वजह क्या है?
सपा को लोकसभा चुनाव 2024 में बड़ी संख्या में पिछड़ों के साथ दलित वर्ग के लोगों ने भी वोट किया था। सपा की ओर बढ़ रहे दलितों के झुकाव से बसपा भी परेशान है। वह यूपी में दोबारा खड़ी होने की कोशिश कर रही है। पिछले कुछ महीनों में मायावती ने न सिर्फ बड़ी रैली की, बल्कि पार्टी में जान फूंकने के लिए कई बैठकें भी की हैं। यूपी में दलित आबादी करीब 20 फीसदी है। यहां 84 विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। लेकिन, सामान्य सीटों पर भी दलित वोट निर्णायक होते हैं। सपा की यह रणनीति बसपा के पारंपरिक वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश है। 2024 में काम आई थी रणनीति
2024 के चुनाव में अखिलेश यादव ने PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के नारे के साथ चुनाव लड़ा था। इसके लिए गैर यादव जाति के लोगों को बड़े पैमाने पर टिकट दिए गए। दो ऐसी सामान्य सीटें थीं, जहां से दलित उम्मीदवार उतारे। सामान्य सीट फैजाबाद में सपा ने अवधेश प्रसाद को उम्मीदवार बनाया, वहीं मेरठ में सुनीता वर्मा को टिकट दिया। फैजाबाद, जिसे भाजपा का गढ़ माना जाता है, वहां सपा की जीत हुई। मेरठ में सपा और भाजपा के बीच हार-जीत का मार्जिन बेहद कम रह गया। अब इसी रणनीति के तहत 2027 के चुनाव की तैयारी की जा रही है। फील्ड में कराया जा रहा सर्वे
सपा ने प्रदेश की जनता का मूड भांपने के लिए अलग-अलग सर्वे टीम मैदान में उतारी हैं। जो ये पता कर रहीं कि किस क्षेत्र से कौन-सा प्रत्याशी मजबूत रहेगा? कौन-कौन सी ऐसी सामान्य सीटें हैं, जहां दलित उम्मीदवारों को टिकट दिया जा सके। जिन सीटों पर सपा के मौजूदा विधायक हैं, उनकी स्थिति क्या है? हाल ही में ऐसी ही एक सीट से सर्वे करके लौटे सर्वेयर ने अपनी रिपोर्ट अखिलेश यादव को सौंपी। इस रिपोर्ट में सपा के एक विधायक के खिलाफ तगड़े विरोध की बात कही गई है। वहीं, पश्चिमी यूपी की कुछ सीटों के नाम दिए गए हैं, जहां पार्टी दलित उम्मीदवार को उतारने पर विचार कर सकती है। इनमें बिजनौर, सहारनपुर, गाजियाबाद और हापुड़ जिले की कुछ सीटें शामिल हैं। यादव और मुस्लिमों के टिकट में होगी कटौती
सपा सूत्रों का कहना है कि दलित समाज के लोगों को टिकट देने के लिए सपा सवर्णों के साथ यादव और मुस्लिमों के टिकटों में कटौती कर सकती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने यादव के नाम पर केवल मुलायम परिवार के ही सदस्यों को टिकट दिया था। ये सभी लोग जीत कर आए थे। वहीं, कुछ मुस्लिम टिकटों की कटौती भी की थी। मसलन मुरादाबाद में एसटी हसन का टिकट काटकर रुचिवीरा को दे दिया गया था। रुचिवीरा ने यहां से जीत हासिल की थी। कुर्मियों को भी मिलेंगी अधिक सीटें
सपा का फोकस इस चुनाव में भी कुर्मी वोटबैंक पर रहेगा। सपा ने 2024 में इस वर्ग के वोटों की ही बदौलत भाजपा को मात देने में कामयाबी हासिल की थी। 62 में से 12 कुर्मी उम्मीदवार लोकसभा चुनाव में उतारे थे। इनमें से 7 को कामयाबी मिली थी। जिन सीटों पर सपा को कामयाबी मिली थी, उनमें से अंबेडकरनगर, बस्ती, श्रावस्ती, प्रतापगढ़, लखीमपुर खीरी, बांदा और फतेहपुर जैसी कुर्मी बाहुल्य सीटें शामिल हैं। इन सभी सीटों पर सपा ने कुर्मी जाति के लोगों को उम्मीदवार बनाया था। विधानसभा चुनाव में भी सपा दलितों के साथ-साथ कुर्मियों पर दांव खेलेगी। यही वजह है कि हाल ही में अखिलेश यादव नए साल पर अपने प्रतापगढ़ से सांसद एसपी पटेल के घर पहुंचे। उनका मकसद और संदेश साफ था। समाजवादी पार्टी के श्रावस्ती से सांसद राम शिरोमणि वर्मा कहते हैं- हम लोग जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं। एसआईआर में बूथ स्तर पर हमारे लोग पहुंचे हैं, लोगों की मदद की। कुर्मी समाज 2024 में भी सपा के साथ था और अब भी पूरी ताकत से सपा के साथ है। सपा ने हमारे समाज को सम्मान दिया है। केवल हमारा समाज ही नहीं, सपा प्रमुख अखिलेश यादव को हर वर्ग और हर जाति के लोगों का साथ मिल रहा। राजनीतिक विश्लेषक हिसाम सिद्दीकी कहते हैं- सपा की यह रणनीति 2024 की सफलता पर आधारित है। सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारना एक मजबूत संदेश है कि पार्टी सामाजिक न्याय की पक्षधर है। यादव-दलित टकराव, जो सपा की चुनौती रही है, उसे खत्म करने के लिए भी ये एक सकारात्मक कदम हो सकता है। जमीनी स्तर पर यादव प्रभाव वाले इलाकों में दलितों का समर्थन मिलेगा या नहीं। इसका अंदाजा चुनाव के समय प्रत्याशी का नाम सामने आने के बाद ही लगेगा। वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र नाथ भट्ट कहते हैं- समाजवादी पार्टी की रणनीति अपना वोट शेयर बढ़ाने और 2024 में जो वोट मिले थे, उसको बचाने की है। सपा ने 2012 में जब सरकार बनाई थी, उस समय उसे 29 फीसदी वोट ही मिले थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने मिलकर करीब 44 फीसदी वोट हासिल किए थे। अगर विधानसभा चुनाव में ये आंकड़ा सपा छू लेती है, तो सपा की सरकार बन जाएगी। ———————— ये खबर भी पढ़ें… सपा की गुपचुप क्या बसपा से चल रही बातचीत?, बिहार नतीजों के बाद यूपी में सपा, कांग्रेस के गठबंधन को लेकर सुर बदले यूपी की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले फिर से गठबंधन की बिसात बिछने लगी है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने कांशीराम की पुण्यतिथि पर भले ही बड़े दलों से दूरी का ऐलान कर दिया हो। लेकिन, बिहार चुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बदले तेवरों ने सियासी चर्चाओं को नई हवा दे दी है। पढ़ें पूरी खबर
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