इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अग्रसेन कन्या पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज वाराणसी में करीब दो दशक से कार्यरत तदर्थ सहायक प्रोफेसरों की सेवाएं समाप्त करने के मामले में कॉलेज प्रबंधन को कड़ी फटकार लगाई है। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने कहा कि इतने लंबे समय तक सेवा देने वाले शिक्षकों को बिना पर्याप्त आधार, स्पष्ट ठोस कारण और दस्तावेजी साक्ष्य के अचानक हटाया नहीं जा सकता। इसी मामले में दाखिल अन्य याचिका पर अदालत ने कालेज प्रबंधन को शिक्षकों को हटाने के कारणों का विस्तृत विवरण देने का निर्देश दिया था। दूसरी तरफ उच्च शिक्षा निदेशक और विद्यापीठ के कुलपति ने शिक्षकों के पक्ष में आदेश दिया है। जिसके खिलाफ कॉलेज प्रबंध समिति ने वर्तमान याचिका दाखिल की है। याची के वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि संबंधित शिक्षक वर्ष 1997 से 2014 के बीच नियुक्त हुए थे, लेकिन उनकी नियुक्ति में सहायक प्रोफेसरों के लिए निर्धारित विधिक प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। साथ ही पिछले पांच-छह वर्षों में हिंदी और समाजशास्त्र जैसे विषयों में छात्र संख्या घटने और वित्तीय संकट के कारण कॉलेज को अपने संसाधनों से वेतन देना कठिन हो गया है। प्रबंधन ने यह भी कहा कि नियुक्तियां ‘स्व-वित्तपोषित योजना’ के तहत नहीं थीं, इसलिए शिक्षकों को पद पर बने रहने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। वहीं, प्रतिवादी शिक्षकों की ओर से तर्क दिया गया कि उनकी नियुक्ति विधिवत प्रक्रिया के तहत ‘स्व-वित्तपोषित योजना’ में हुई थी और वे वर्षों से निरंतर सेवाएं दे रहे हैं। उन्हें 20 साल बाद हटाना मनमाना कदम है। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि प्रबंधन पुराने शिक्षकों को हटाकर नए लोगों की भर्ती करना चाहता है। कोर्ट ने कहा कि लंबी सेवा अवधि को देखते हुए केवल वित्तीय तंगी या छात्र संख्या में कमी का हवाला देकर सेवा समाप्ति उचित नहीं है। अदालत ने कॉलेज को संबंधित विश्वविद्यालय के सक्षम प्राधिकारी के समक्ष सभी दस्तावेज और तथ्यों के साथ अपना पक्ष रखने की छूट दी है। विश्वविद्यालय को चार सप्ताह के भीतर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है। साथ ही अंतरिम राहत देते हुए अदालत ने कहा कि अंतिम फैसला आने तक शिक्षक अपने पद पर कार्यरत रहेंगे और कॉलेज प्रबंधन उन्हें नियमित रूप से वेतन देता रहेगा।
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