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लखनऊ में ‘स्क्रीन टाइम टू एक्टिविटी टाइम’ संगोष्ठी:युवाओं को डिजिटल लत के प्रति जागरूक किया

लखनऊ में स्क्रीन टाइम टू एक्टिविटी टाइम’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय ‘स्क्रीन टाइम टू एक्टिविटी टाइम’ था। यह कार्यक्रम अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद लखनऊ महानगर और एनएसएस आईटी कॉलेज, सीतापुर रोड के सहयोग में किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवाओं को जागरूक करना था। संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांत रंजन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अभाविप के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. राज शरण शाही ने मुख्य वक्ता की भूमिका निभाई। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईटी कॉलेज के निदेशक प्रो. विनीत कंसल ने की, जबकि कुंवर ग्लोबल स्कूल के निदेशक पार्थ सिंह विशिष्ट अतिथि रहे। स्वागत अध्यक्ष अनिल अग्रवाल, अभाविप महानगर उपाध्यक्ष विजय लोधी और महानगर मंत्री सरिता पांडे भी मंच पर मौजूद थे। चेतावनी दी कि स्मार्टफोन एक सुविधा है मुख्य अतिथि स्वांत रंजन ने अपने संबोधन में कहा कि प्राचीन काल में कुश्ती और तलवारबाजी जैसी गतिविधियां मनोरंजन और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम थीं। उन्होंने चेतावनी दी कि स्मार्टफोन एक सुविधा है, लेकिन इसका अत्यधिक उपयोग डिजिटल एडिक्शन का कारण बन रहा है, जिससे मानसिक तनाव, नींद की कमी और आंखों की समस्याएं बढ़ रही हैं। रंजन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशिक्षण का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां ‘मोबाइल पार्किंग’ की व्यवस्था होती है, ताकि कार्यकर्ता एकाग्रता से सीख सकें। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख किया, जिन्होंने युवाओं को खेलकूद के लिए प्रेरित किया ताकि स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन का विकास हो सके। 1986 की शिक्षा नीति का जिक्र किया मुख्य वक्ता प्रो. राज शरण शाही ने अपने उद्बोधन में कहा कि स्वतंत्रता के बाद से भारत को ‘विश्व गुरु’ के रूप में पुनः स्थापित करने की आकांक्षा रही है। उन्होंने बताया कि प्राचीन भारत अपनी उत्कृष्ट शिक्षा प्रणाली और ज्ञान परंपरा के कारण विश्व का मार्गदर्शक था। उन्होंने 1986 की शिक्षा नीति का जिक्र किया, जिसने तकनीक को शिक्षा का साधन माना था, न कि मंजिल। प्रो. शाही ने स्मार्टफोन को दोधारी तलवार बताते हुए कहा कि यदि इसका उपयोग अनुशासन के साथ किया जाए तो यह लाभदायक है, अन्यथा हानिकारक।


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