इस बार माघ मेला में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज का शिविर भक्तों के लिए श्रद्धा और आस्था का बड़ा केंद्र बनने वाला था। वे विशेष पूजन के लिए करीब सवा लाख शिवलिंग लेकर माघ मेला पहुंचे थे। शिविर में शिवलिंग पूजन, यज्ञ, कथा, प्रवचन और भक्तों के लिए विशेष दर्शन जैसे कई कार्यक्रम तय थे। लेकिन मौनी अमावस्या के दिन स्नान को लेकर हुए विवाद ने पूरे आयोजन की दिशा ही बदल दी। प्रशासन और शंकराचार्य के बीच स्नान को लेकर मतभेद हो गया। आरोप है कि शंकराचार्य को ससम्मान स्नान नहीं करने दिया गया। इसके बाद शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज ने विरोध स्वरूप शिविर में प्रवेश करने से इनकार कर दिया और शिविर के बाहर हट पर बैठ गए। शंकराचार्य ने साफ कहा कि जब तक उन्हें ससम्मान स्नान नहीं कराया जाएगा, वे शिविर में प्रवेश नहीं करेंगे। यह धरना लगातार 11 दिनों तक चलता रहा। इस दौरान शिविर में कोई धार्मिक आयोजन नहीं हो सका। श्रद्धालु रोज़ उम्मीद लेकर आते रहे, लेकिन शिविर सूना ही रहा। आखिरकार शंकराचार्य माघ मेला छोड़कर वाराणसी रवाना हो गए। उनके जाने के बाद शिविर को समेटने की प्रक्रिया शुरू हुई। जो सवा लाख शिवलिंग विशेष पूजन के लिए लाई गई थीं, वे बैरंग पैक होकर वापस भेज दी गईं। कई बड़े कार्यक्रम, जिनकी तैयारी महीनों से चल रही थी, बिना हुए ही रह गए। मेला समाप्त होने से पहले ही शंकराचार्य का शिविर उजड़ने लगा। जहां कभी भव्य पूजन और प्रवचनों की गूंज होनी थी, वहां अब खाली पंडाल और समेटे जा रहे सामान दिखाई दे रहे हैं। विवाद के चलते इस बार माघ मेला में शंकराचार्य का शिविर आस्था का केंद्र बनने से पहले ही वीरान हो गया।
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