इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगरा की प्रतिष्ठित बलवंत एजुकेशनल सोसाइटी के प्रबंधन से जुड़े लंबे समय से चल रहे पारिवारिक विवाद पर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि ‘राजा’ जैसी उपाधियां अब कानूनी रूप से अस्तित्व में नहीं हैं और ऐसे जटिल प्रबंधन विवादों का निपटारा रिट याचिका के माध्यम से नहीं, बल्कि सक्षम सिविल न्यायालय में ही किया जाएगा।
अदालत ने एकल पीठ द्वारा दिया गया वह आदेश भी रद्द कर दिया, जिसमें दो भाइयों के बीच उपाध्यक्ष पद का कार्यकाल आधा-आधा बांटने का निर्देश दिया गया था। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने यह फैसला अनिरुद्ध पाल सिंह और जितेंद्र पाल सिंह के बीच चल रहे वर्चस्व विवाद पर सुनवाई करते हुए दिया। दोनों भाई राजा बलवंत सिंह की विरासत और उनके द्वारा स्थापित ट्रस्ट/सोसाइटी में ‘उपाध्यक्ष’ पद पर अधिकार को लेकर आमने-सामने थे। इससे पहले एकल पीठ ने समझौते के तौर पर दोनों को ढाई-ढाई साल का कार्यकाल देने का फॉर्मूला तय किया था। खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि रिट कोर्ट का दायरा सीमित होता है और वह प्रबंधन चलाने के लिए कोई नई कार्यप्रणाली तैयार नहीं कर सकता। ऐसा करना अनुच्छेद 226 के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। अदालत ने यह भी दोहराया कि स्वतंत्रता के बाद ‘राजा’ जैसी उपाधियां समाप्त हो चुकी हैं, इसलिए केवल वंश या टाइटल के आधार पर किसी पद का दावा नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने माना कि मामले में वसीयत की व्याख्या, जन्मतिथि से जुड़े विवाद और सोसाइटी के उपनियमों की जटिलताएं शामिल हैं, जिनके समाधान के लिए साक्ष्यों और विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता है। ऐसे तथ्यात्मक विवादों का फैसला केवल सिविल कोर्ट ही कर सकता है। अंततः हाईकोर्ट ने 06 नवंबर 2025 के एकल पीठ के आदेश को रद्द करते हुए दोनों पक्षों को स्वतंत्रता दी कि वे अपने अधिकारों और पद के निर्धारण के लिए विधि अनुसार सिविल कार्यवाही या अन्य उपयुक्त कानूनी मंच का सहारा लें।
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