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पारस के लिए आसान नहीं होगी जुवेनाइल की राह:उम्र की याचिका पर आज फिर सुनवाई, वादी ने मांगे हैं कक्षा चार के कागजात

मेरठ कपसाड़ कांड के आरोपी पारस सोम की उम्र से जुड़ी याचिका पर आज फिर सुनवाई होगी। इस बार वादी पक्ष ने उम्र की हकीकत जानने के लिए कोर्ट के माध्यम से पारस सोम का कक्षा चार का सर्टिफिकेट तलब कराया है। सर्टिफिकेट में पारस की उम्र कितनी है, यह तो कोर्ट में प्रस्तुत किए जाने वाले सर्टिफिकेट से पता चल ही जाएगा लेकिन कानून के जानकारों की मानें तो केस जुवेनाइल में ट्रांसफर होने के बाद भी पारस की राह आसान नहीं होगी। इसके लिए उस बदलाव का हवाला दिया जा रहा है जो निर्भया कांड के बाद जुवेनाइल से जुड़े एक्ट में किए गए थे…! उम्र के लिए लगाए यह दस्तावेज… पहले जानिये क्या है याचिका
मामला मेरठ के सरधना थाना क्षेत्र अंतर्गत स्थित ग्राम कपसाड़ से जुड़ा है, जहां के पारस सोम पर महिला की हत्या कर उसकी बेटी को अगवा करने का आरोप है। पारस वर्तमान में जेल में बंद है। उसके अधिवक्ताओं संजीव राणा, बलराम सोम और विजय शर्मा ने दावा किया था कि वारदात के वक्त पारस नाबालिक था और उसका मामला जुवेनाइल बोर्ड के अंतर्गत सुना जाना चाहिए। केस ट्रांसफर करने के लिए ही याचिका डाली गई थी। एक नजर डालते हैं कपसाड़ कांड पर
सरधना के कपसाड़ गांव का रहने वाला पारस सोम 8 जनवरी को इसी गांव की दलित समाज की युवती रूबी को अगवा कर फरार हो गया था। जाते वक्त उसने विरोध करने वाली रूबी की मां सुनीता पर जानलेवा हमला किया था, जिसकी बाद में उपचार के दौरान मौत हो गई थी। पुलिस ने हत्या, अपहरण समेत कई धाराओं में मुकदमा दर्ज किया और दो दिन बाद आरोपी को सहारनपुर से गिरफ्तार कर रूबी को सकुशल बरामद कर लिया। सर्टिफिकेट में आरोपी पारस नाबालिग
कपसाड़ कांड कई दिन तक चर्चाओं में रहा। इसी बीच तीन अधिवक्ताओं का एक पैनल सामने आया और उसने पारस की जन्मतिथि 11-5-2008 बताते हुए मामले की सुनवाई जेजे बोर्ड के अंतर्गत करने की याचिका दायर कर दी। 14 जनवरी को यह याचिका दायर की गई, जिसे कोर्ट ने स्वीकार भी कर लिया। एडवोकेट संजीव राणा का दावा है कि इस जन्मतिथि के अनुसार वारदात के वक्त पारस की उम्र उम्र 17 साल, 7 महीने, 25 दिन है। आइए क्रम से जानते हैं कोर्ट की प्रोसिडिंग
– 10 जनवरी को पारस सोम को कोर्ट ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जिला कारागार भेज दिया।
– 14 जनवरी को तीन अधिवक्ताओं के पैनल ने हाई स्कूल सर्टिफिकेट से जुड़ी रूलिंग के साथ पारस की तरफ से याचिका डाली।
– 22 जनवरी को याचिका मंजूर हुई और कोर्ट ने वादी पक्ष के सभी लोगों को नोटिस जारी कर दिए।
– 31 जनवरी को वादी पक्ष ने बेसिक शिक्षा से जुड़े सर्टिफिकेट की रूलिंग लाने का दावा किया।
– 3 फरवरी को वादी पक्ष रूलिंग उपलब्ध नहीं कर पाया और तारीख मांगी।
– 4 फरवरी की तिथि कोर्ट की तरफ से निर्धारित कर दी गई।
– 4 फरवरी को वादी पक्ष ने कक्षा 5 का सर्टिफिकेट जारी किया लेकिन उसमें भी पारस की जन्मतिथि हाईस्कूल के अनुसार 11-5-2008 ही निकली।
– अब कक्षा 1 से कक्षा चार तक के सर्टिफिकेट 7 फरवरी को तलब किए गए हैं। अब एक नजर जुवेनाइल एक्ट पर
वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल बख्शी बताते हैं कि जुवेनाइल एक्ट 1986 में आया था। इस एक्ट के अनुसार- 18 वर्ष से कम उम्र के लोग जुवेनाइल माने जाते थे। वर्ष 2000 में कानून में कुछ बदलाव हुआ और 16 वर्ष तक के बच्चों को जुवेनाइल मान लिया गया। लेकिन इसके बाद भी समय समय पर बदलाव होते रहे। निर्भया कांड ने फिर बदले समीकरण
अनिल बख्शी बताते हैं कि निर्भया कांड के बाद वर्ष 2015 में एक्ट में फिर बदलाव हुआ। इस बार दो श्रेणी निर्धारित कर दी गईं। पहली श्रेणी में 16 से नीचे की उम्र के आरोपी सीधे जुवेनाइल मान लिए गए और बड़े अपराध में अधिकतम तीन साल की सजा का प्रावधान कर दिया गया। लेकिन दूसरी श्रेणी (16 से 18 वर्ष के बीच) के आरोपियों के लिए मनोवैज्ञानिक टेस्ट निर्धारित किया गया। इसमें काउंसलर पर निर्भर करता है। पॉजीटिव रिजल्ट होने पर केस स्पेशल कोर्ट में चलता है। जुवेनाइल के लिए यह दस्तावेज की प्रक्रिया
– आरोपी पढ़ा लिखा है तो उसका हाईस्कूल सर्टिफिकेट।
– हाईस्कूल नहीं है तो सरकारी बर्थ सर्टिफिकेट।
– हाईस्कूल व बर्थ सर्टिफिकेट नहीं है तो सबसे पहले जिस स्कूल में प्रवेश लिया, उसका सर्टिफिकेट। सर्टिफिकेट ना होने पर मेडिकल का प्रावधान वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल बख्शी की मानें- जुवेनाइल घोषित करने के लिए सर्टिफिकेट महत्वपूर्ण है। लेकिन अगर तीनों में कोई सर्टिफिकेट नहीं है तो आरोपी का मेडिकल कराया जाएगा। तीनों सर्टिफिकेट में एक भी गलत साबित होता है तो मेडिकल नहीं होगा। इसमें दो अलग कक्षाओं में प्रवेश के वक्त की उम्र की जांच होती है। उम्र बदलने वाले स्कूल से जवाब लिया जाता है। इसमें आरोपी नाबालिग नहीं रहता। उसे सामान्य अपराधी की तरह ट्रीट किया जाता है लेकिन नाम व पहचान गोपनीय रहती है और फांसी तथा आजीवन कारावास नहीं होता।


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