मुजफ्फरनगर में दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के पास बन रही न्यूमैक्स इंटीग्रेटेड टाउनशिप विवादों में घिर गई है। न्यूमैक्स रियलकॉन प्राइवेट लिमिटेड की इस परियोजना पर भूमि खरीद, स्वामित्व हस्तांतरण और कानूनी वैधता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कंपनी ने सहारा इंडिया ग्रुप की हजारों बीघा विवादास्पद जमीन का बड़ा हिस्सा खरीदा है, लेकिन खरीद-फरोख्त के दस्तावेजों, भुगतान और स्वामित्व ट्रांसफर में पारदर्शिता की कमी है। एक महिला किसान की जमीन पर कथित कब्जे और बाद में समझौते का मामला भी सामने आया है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि इस परियोजना को भूकंप जोन, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और बढ़ते प्रदूषण को नजरअंदाज करते हुए मंजूरी दी गई है। आरोप है कि परियोजना के लिए आवश्यक पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) भी नहीं कराया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि टाउनशिप को अभी तक किसी भी आधिकारिक प्राधिकरण, जैसे विकास प्राधिकरण, से मंजूरी, सीसी-ओसी (कम्प्लीशन सर्टिफिकेट-ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट) या रेरा (RERA) पंजीकरण प्राप्त नहीं हुआ है। इसके बावजूद, कंपनी ने सैकड़ों प्लॉट्स की रजिस्ट्री करा दी है। इनमें एक ही महिला के नाम पर दो रजिस्ट्रियां होने का मामला भी शामिल है, जो प्रक्रिया पर और सवाल खड़े करता है। सामाजिक कार्यकर्ता विकास बालियान का कहना है कि बिना प्राधिकरण मंजूरी, ATP, ड्रेनेज और बुनियादी ढांचे के सिर्फ “एग्रीमेंट टू सेल” वैध नहीं माना जाता। रजिस्ट्री गैरकानूनी है। इसके बावजूद 33 हजार केवीए हाई टेंशन लाइन के ठीक नीचे स्टेडियम-पार्क दिखाकर प्लॉट बेचे जा रहे हैं, जो सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक है। चौंकाने वाली बात यह है कि परियोजना के शिलान्यास और प्रचार में सबसे आगे रहे योगी सरकार के मंत्री समेत जिले के सत्ता-विपक्ष के सभी जनप्रतिनिधि और समाजिक संगठन पूरी तरह खामोश हैं। न कोई समर्थन, न कोई सवाल। मंत्री असमंजस में हैं क्योंकि पहले वे इस प्रोजेक्ट के चेहरा थे, अब सवालों से बच रहे हैं।। कंपनी की ओर से लगातार सेलिब्रिटी शोज, नकद छूट, उपहार योजनाएं और “सभी प्लॉट बिक गए” जैसे विज्ञापनों से निवेशकों को लुभाया जा रहा है, जबकि दूसरी तरफ नई बुकिंग और डिस्काउंट ऑफर चल रहे हैं। इससे पारदर्शिता पर सवाल गहरा रहे हैं। हजारों निवेशक अपनी जीवनभर की जमा पूंजी डूबने के डर से तनाव में हैं। योगी सरकार जीरो टॉलरेंस की बात करती है, लेकिन मुजफ्फरनगर के इस कथित भूमि घोटाले पर सत्ता से लेकर विपक्ष तक की खामोशी कई सवाल खड़े कर रही है। निवेशकों से अपील है कि बिना पूरी कानूनी जांच-पड़ताल के ऐसी परियोजनाओं में पैसा न लगाएं, वरना मेहनत की कमाई डूब सकती है
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