इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में टिप्पणी की है कि प्रदेश में निजी परिसरों के भीतर धार्मिक प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए किसी पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहाँ धार्मिक प्रार्थना सभा सार्वजनिक सड़क या सार्वजनिक संपत्ति तक फैलती है, तो याचिकाकर्ता पुलिस को सूचित करेंगे और कानून के तहत आवश्यक अनुमति लेंगे। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने यह आदेश मारनथा फुल गॉसपेल मिनिस्ट्रीज और इमैनुएल ग्रेस चैरिटेबल ट्रस्ट की याचिकाओं पर दिया है। दोनों ईसाई संस्थाएं अपने निजी परिसरों में प्रार्थना आयोजित करने की अनुमति मांग रही थीं। न्यायालय ने राज्य सरकार के उस बयान को संज्ञान में लेते हुए याचिकाएं निस्तारित कीं , जिसमें कहा गया था कि कानून में ऐसी अनुमति लेने की कोई अनिवार्यता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से स्पष्ट रूप से कहा गया है कि याचिकाकर्ता पर अपने निजी परिसर के भीतर धार्मिक प्रार्थना सभा आयोजित करने पर कोई रोक नहीं है। यह भी कहा गया है कि राज्य की संस्थाओं द्वारा बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों को कानून का समान संरक्षण प्रदान किया जाता है। कोर्ट ने आगे कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 (जो नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है) के तहत मौलिक अधिकार का पालन करने के लिए कानूनन किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने याचिकाओं का निपटारा करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं को अपनी सुविधा के अनुसार निजी परिसर में बिना सरकारी अनुमति के प्रार्थना करने का अधिकार है। साथ ही यदि सुरक्षा की आवश्यकता होती है, तो राज्य यह तय कर सकता है कि वह सुरक्षा किस प्रकार प्रदान की जाए।
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