उत्तर प्रदेश में गौवंश संरक्षण को लेकर सरकार के बड़े-बड़े दावों की जमीनी हकीकत विकास खंड जोगिया के ग्राम खेतवल मिश्र स्थित गौशाला में पूरी तरह उजागर हो गई। दैनिक भास्कर की पड़ताल में सामने आई तस्वीरें न सिर्फ दिल दहला देने वाली हैं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की घोर विफलता और लापरवाही का जीवंत सबूत भी हैं। गौशाला के गेट पर ताला, अंदर तड़पती जिंदगी गौशाला के बाहर पहुंचते ही जो दृश्य सामने आया, वह खुद में कई सवाल खड़े करता है। मुख्य द्वार पर ताला लटका हुआ था। यानी जिन बेसहारा गायों की सुरक्षा और देखभाल के लिए यह गौशाला बनाई गई, वे अंदर बंद होकर तड़प रही थीं। मौके पर न कोई कर्मचारी मौजूद था, न चौकीदार और न ही कोई जिम्मेदार अधिकारी। यह साफ संकेत था कि गौशाला की पूरी व्यवस्था भगवान भरोसे छोड़ दी गई है। ताला खुला तो दिखी प्रशासनिक संवेदनहीनता की भयावह तस्वीर जब ताला खुलवाकर अंदर प्रवेश किया गया, तो हालात और भी भयावह निकले। गौशाला परिसर में दो गायें अर्धमृत अवस्था में पड़ी थीं, असहनीय पीड़ा से कराह रही थीं। उनकी आंखें फूटी हुई थीं, शरीर पर गहरे, सड़ते हुए घाव थे। चारों ओर चील और कौवे उनके अंगों को नोचते हुए मंडरा रहे थे। यह दृश्य किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि एक गंभीर प्रशासनिक अपराध का प्रमाण था। स्पष्ट था कि इन गायों को कई दिनों से न चारा मिला था, न पानी और न ही कोई पशु चिकित्सा सुविधा। गौशाला के नाम पर बना यह परिसर दरअसल मौत का बाड़ा बन चुका था। चारे का एक तिनका तक नहीं, पानी की भी व्यवस्था नहीं सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि पूरी गौशाला में चारे का एक तिनका तक मौजूद नहीं था। न सूखा भूसा, न हरा चारा और न ही पीने के पानी की कोई समुचित व्यवस्था। जिन गौशालाओं के संचालन और रखरखाव के लिए सरकार हर साल नियमित बजट जारी करती है, वहां यह सवाल खुद-ब-खुद खड़ा हो गया—आखिर वह पैसा जा कहां रहा है? इस पूरे प्रकरण में वित्तीय अनियमितताओं की आशंका भी गहराती जा रही है। मुख्यमंत्री के सख्त निर्देश, फिर भी जमीनी हकीकत शर्मनाक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गौवंश संरक्षण को लेकर सख्त नीति और स्पष्ट निर्देशों के लिए जाने जाते हैं। निराश्रित गोवंश के संरक्षण के लिए विशेष योजनाएं लागू की गईं, गौशालाओं के लिए करोड़ों रुपये स्वीकृत किए गए और अधिकारियों को साफ निर्देश दिए गए कि गौमाता की उपेक्षा किसी भी हाल में न हो। लेकिन खेतवल मिश्र की यह गौशाला बताती है कि मुख्यमंत्री के आदेश यहां सिर्फ फाइलों तक सीमित रह गए, जबकि जमीनी स्तर पर उनकी खुलेआम अनदेखी हो रही है। BDO की भूमिका पर उठे सबसे बड़े सवाल इस पूरे मामले में सबसे गंभीर सवाल खंड विकास अधिकारी (BDO) की भूमिका को लेकर खड़े हो रहे हैं। गौशालाओं का नियमित निरीक्षण, चारा आपूर्ति, पशु चिकित्सा व्यवस्था और कर्मचारियों की तैनाती सीधे तौर पर बीडीओ की जिम्मेदारी होती है। सवाल यह है कि क्या उन्हें इस गौशाला की बदहाली की जानकारी नहीं थी? अगर नहीं थी, तो यह घोर लापरवाही है। और अगर थी, तो यह सीधी-सीधी कर्तव्यहीनता और अपराध की श्रेणी में आता है। कागजों में सब कुछ दुरुस्त दिखाया जा रहा था, लेकिन जमीनी सच्चाई ने इन दावों की धज्जियां उड़ा दीं। ग्रामीण बोले—शिकायतें होती रहीं, कार्रवाई नहीं हुई स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि गौशाला की बदहाली को लेकर कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला। न कोई ठोस जांच हुई और न हालात सुधरे।
ग्रामीणों का आरोप है कि जब तक मीडिया ने मौके पर पहुंचकर सच्चाई उजागर नहीं की, तब तक जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे रहे। यह चुप्पी भी उतनी ही दोषपूर्ण मानी जा रही है, जितनी प्रत्यक्ष लापरवाही। डीएम ने दिए जांच के आदेश, कार्रवाई का भरोसा मामले के सामने आने के बाद जिलाधिकारी शिवशरणप्पा जी.एन. ने प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं। डीएम ने कहा है कि मामले की विस्तृत जांच कराई जाएगी और जो भी अधिकारी या कर्मचारी दोषी पाए जाएंगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही गौशाला की स्थिति में तत्काल सुधार, घायल गायों के इलाज और चारा-पानी की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित कराने के निर्देश भी दिए गए हैं।
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