गाजियाबाद में तीन फरवरी की रात तीन बहनों के सुसाइड केस में पिता की तमाम बातें सामने आईं, लेकिन बच्चियों की मां अब तक सामने नहीं आई हैं। जिस वक्त बच्चियां नीचे गिरी थी, उस वक्त मां चीख-चीखकर रो रही थी। पति को गाली दे रही थी। अपने कपड़े बच्चियों के खून पर डाल रही थी। पुलिस ने जैसे ही तीनों बॉडी अपने कब्जे में लेकर मॉर्चरी भेजीं, मां को दूसरी तरफ घर में कैद कर दिया गया। परिवार का कोई भी व्यक्ति अब सामने नहीं आ रहा। मौत का यह मामला आर्थिक तंगी से तो जुड़ा है, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा घर के रोज-रोज झगड़े से भी जुड़ा है। घर में इतनी कलह थी कि बच्चियों पर ध्यान ही नहीं दिया गया। बच्चियां कलह के बीच अकेली हो गईं। ‘दैनिक भास्कर ऐप’ टीम ने घर की आर्थिक कलह को समझने की कोशिश की। कुछ ऐसे लोगों से बात की जो परिवार से जुड़े हैं। आइए समझते हैं… दो सगी बहनों से शादी, तीसरी शादी मुस्लिम से की गाजियाबाद जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर टीलामोड़ इलाके में भारत सिटी सोसाइटी है। इस सोसाइटी में 1 हजार से ज्यादा फ्लैट हैं। इसी में बी-1 टॉवर के नौवें फ्लोर पर फ्लैट नंबर 907 में चेतन अपने परिवार के साथ रहते हैं। चेतन के साथ उनकी तीन पत्नियां रहती थीं। दो पत्नियां सुजाता और हीना बहन थीं और तीसरी मुस्लिम थी। सुजाता और हीना की एक और बहन भी यहां आकर कभी-कभी रहती थी। इन सबके अलावा 5 बच्चे इस फ्लैट में रहते थे। 4 फरवरी की रात करीब 2 बजे तीन लड़कियां बिल्डिंग से नीचे गिर गईं। तीनों की मौत हो गई। उसके बाद से इस बिल्डिंग में सन्नाटा पसरा है और परिवार ने दरवाजा बंद कर लिया है। दैनिक भास्कर की टीम पहुंची तो हमारी मुलाकात मोहल्ले की ही कुछ महिलाओं से हुई। ये कहती हैं कि सुसाइड से पहले इनके घर से लगातार आवाज आ रही थी, गाली-गलौज हो रही थी। सोसाइटी की ही निशा चतुर्वेदी कहती हैं, जिस वक्त बच्चियां गिरीं, तब उनकी मां भागते हुए नीचे पहुंचीं। वह जोर-जोर से चिल्ला रही थीं। कह रही थीं कि सबको बता दूंगी। गाली भी दे रही थीं। वह अपने कपड़े उतारकर बच्चों के ऊपर डाल रही थीं। पहले अपनी स्वेटर, फिर शॉल बच्चियों के शव पर डाल दी। वह बहुत रो रही थीं। लेकिन आदमी बेचैन या फिर परेशान नहीं दिख रहा था। वहीं पास में कई और महिलाएं थीं। वह इस पूरे मामले पर सवाल उठाते हुए कहती हैं, अगर कोई एक लड़की सुसाइड के बारे में सोचती तो दूसरी-तीसरी बताती, लेकिन यहां तो तीनों ही चले गए। उनके बारे में कहा जा रहा कि स्कूल नहीं जाती थीं, अरे पैसा नहीं था तो यहीं पास में सरकारी स्कूल था, उसमें भेज देते। लेकिन इन लोगों ने बच्चियों पर ध्यान ही नहीं दिया। एक अन्य महिला कहती हैं, एक बीवी से मन नहीं भरा, फिर दूसरी से कर ली, फिर तीसरी भी शादी कर ली। बच्चों का ध्यान ही नहीं दिया। ‘ये कभी बाहर ही नहीं आए कि बात हो’ तमाम लोगों से बातचीत के बाद हम नौवें फ्लोर पर पहुंचे। दरवाजा अंदर से बंद था। पिता चेतन शेयर ट्रेडिंग का काम करते हैं। चेतन के एक रिश्तेदार आए थे, उसके चलते दरवाजा खोला, लेकिन तुरंत ही बंद कर लिया। 904 नंबर फ्लैट में राजीव चौहान रहते हैं। वह कहते हैं, हम एक ही फ्लोर पर जरूर रहते हैं, लेकिन हमारी कभी मुलाकात नहीं हुई। बच्चों को एक-दो बार लिफ्ट में देखा, उनसे भी कोई बातचीत नहीं की। हमारे बच्चे नीचे जाते हैं, खेलते हैं, लेकिन इनके बारे में कुछ भी नहीं कहते। पड़ोस के ही कुछ और लोग ऑफ कैमरा कहते हैं, ये घर कलह का घर बन गया था। हर दिन लड़ाई-झगड़ा चलता रहता था। ये लोग बाहर नहीं आते थे, इसलिए हम लोग भी इनके मामलों में नहीं पड़ते थे। एक व्यक्ति कहते हैं, गाजियाबाद में शायद ही कोई ऐसा परिवार हो जो तीन बीएचके फ्लैट में रहता हो और उसके बच्चे स्कूल न जाते हों। ये सब कलह की वजह से ही था। बच्चियां पढ़ाई नहीं करती थीं, इसलिए इधर-उधर उनका ध्यान चला गया। दोनों मां गुमसुम, सिर्फ रो रहीं हम परिवार के बारे में जानना चाहते थे, लेकिन कोई बताने को तैयार नहीं। तभी चार महिलाएं घर से निकलीं। लेकिन उनके साथ एक व्यक्ति थे, जो बात करने से मना कर रहे थे। नीचे वह व्यक्ति लौटे तो हमने महिलाओं से बात की। हमें पता चला कि चेतन की जो दो पत्नियां सुजाता और हीना हैं, उनका घर दिल्ली के सीलमपुर में है। वहीं से ये लोग बेटियों की मौत की सूचना के बाद यहां आए थे। एक महिला कहती हैं, हम अंदर गए थे, लेकिन सब रो ही रहे हैं। सुजाता और हीना की बेटियां थीं, वह तो किसी से कोई बात ही नहीं कर रहीं। हमारे साथ सुजाता की मां भी आई हैं, वह भी दोनों को समझा रही हैं। सुजाता कुल नौ बहन हैं। सबसे बड़ी यही है, शुरुआत में इसको बच्चा नहीं हो रहा था, 3 साल बाद ही घरवालों ने हीना की भी शादी चेतन से कर दी। हीना ने निशिका और प्राची को जन्म दिया। तभी सुजाता भी प्रेग्नेंट हुई और सिंडी को जन्म दिया। इसके बाद एक बेटे को जन्म दिया, वह दिव्यांग है। बोल-सुन नहीं सकता। उसकी उम्र 7 साल है। पहले यह चर्चा थी कि चेतन ने तीसरी शादी अपनी साली से की थी। सीलमपुर की कुसुमा कहती हैं कि ऐसा नहीं है। तीसरी पत्नी एक मुस्लिम है, उसको भी एक 4 साल की बेटी है। सभी यहीं आकर रहते हैं। साली भी आकर कभी-कभी रहती थी। हालांकि यह जो कुछ भी हुआ बहुत खराब हुआ। ऐसा नहीं होना चाहिए था। जहां लाशें पड़ी थीं उससे सस्पेंस बढ़ा 9वें फ्लोर से नीचे गिरने के बाद लड़कियों के शरीर के ज्यादातर अंग फट गए। मौके पर ही मौत हो गई। एक लाश दीवार से 9 फीट की दूरी पर थी, दूसरी 8 फीट की दूरी पर। तीसरी लाश दीवार से एकदम सटी हुई थी। महज 1 फीट का ही फासला था। कॉलोनी के ही लोग इस पर सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं कि कोई अगर वहां से कूदेगा तो दीवार के एकदम करीब कैसे गिर सकता है? क्योंकि बाकी दोनों बच्चियां तो दीवार से दूर गिरी हैं। पुलिस को जो सुसाइड नोट मिला है, उसमें भी हम के बजाय मैं शब्द का इस्तेमाल करते हुए लिखा गया है। ऐसा लगता है कि किसी एक लड़की ने यह सब लिखा है। उसमें एक लाइन लिखी मिली- मार खाने से अच्छा है मरना…। इससे इस बात को भी बल मिलता है कि घर में बच्चियों के साथ मारपीट भी होती रही है। 3 फरवरी की रात से 4 फरवरी तक क्या-क्या हुआ, समझिए..
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