1991 की बात है। मैं कांशीराम साहब के साथ फतेहपुर के पुराने पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस में रुका था। एक बड़े कमरे में वह सोए, बगल के छोटे कमरे में मैं था। रात करीब 2 बजे नींद टूटी तो उन्हें कमरे में टहलते और खांसते देखा। तबीयत के बारे में पूछा तो बोले- नींद नहीं आती। दवा की बात की तो कहा-दवा नहीं मिलेगी। फिर बोले-बैठ जा, पहले मर्ज तो समझ ले। हर रात मेरी 2 बजे आंख खुल जाती है। सारी रात इसी सोच में गुजर जाती है कि बाबा साहब अंबेडकर शोषित समाज को हुक्मरान नहीं बना पाए। क्या मैं अपनी जिंदगी में यह कर पाऊंगा या ऐसे ही चला जाऊंगा? यही मेरा मर्ज है, जाओ दवा ला सको तो लाओ। मैं भावुक हो गया। कहा, मेरी उम्र आपको लग जाए। सियासत में अपना अलग मुकाम बना चुके और हाल ही में कांग्रेस से इस्तीफा देने वाले पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने यह बात दैनिक भास्कर से कही। 2027 यूपी विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने अचानक कांग्रेस क्यों छोड़ी? उनका अगला सियासी कदम क्या होगा? फौज की नौकरी छोड़कर राजनीति में कैसे आना हुआ? पढ़ें पूरा इंटरव्यू… सवाल: कांग्रेस में 8 साल रहे। अब इस्तीफा दे चुके हैं। अगला सियासी कदम क्या होगा? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: देखिए, मैंने जो कांग्रेस छोड़ी है, वह फैसला एक दिन का नहीं है। इस फैसले को लेकर लंबे वक्त से सोच रहा था। अपने लोगों से सलाह कर रहा था। जब 24 जनवरी को मैंने कांग्रेस छोड़ा तो अकेला नहीं था। मेरे साथ 73 और लोग थे। बहुत से जिम्मेदार ऐसे थे जो उस दिन नहीं थे। हम सभी से सलाह ले रहे हैं। इसके लिए मैं अलग–अलग जिलों में उनके पास जा रहा हूं। मैं सलाह ले रहा हूं कि मेरा अगला कदम क्या होना चाहिए? अगर किसी पार्टी में जाना है तो किस पार्टी में जाना है। इसके साथ-साथ अगर अपना संगठन बनाना है तो कैसे चलाना है, क्या करना है। इसके बाद मैं अपने पत्ते साफ कर दूंगा। सवाल : आपकी राजनीति की शुरुआत बसपा से हुई थी, वो आपका पुराना घर भी है। क्या बसपा में जाने की कोई गुंजाइश है? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: नहीं, वहां जाने की कोई गुंजाइश नहीं है। एक बार जहां से निकाला जा चुका हूं, वहां जाने का कोई मतलब नहीं। वैसे भी वहां जाने का मेरा कोई इरादा भी नहीं है। सवाल : आप स्पोर्ट्समैन थे। फिर फौज में भर्ती हुए। अचानक राजनीति में कैसे आना हुआ? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: फौज में मेरा सिलेक्शन स्पोर्ट्स कोटे से हुआ था। नौकरी के दौरान मेरी माताजी को हार्ट अटैक पड़ा और वो कोमा में चली गईं। मैंने छुट्टी मांगी। छुट्टी नहीं मिली। मैंने अपने अधिकारी से कहा कि मैं एक दिन में लौट आऊंगा। मैं मेरठ में तैनात था। उन्होंने कहा भाई छुट्टी नहीं मिल सकती। मैंने कहा रास्ता बताइए क्या करूं? कैसे जाऊं? मेरी मां कोमा में हैं। बोले- रिजाइन दे दो चले जाओ। बस रिजाइन दे दिया। चले आए। सवाल : फिर राजनीति में आप कैसे आए? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: मैं माता जी की अंतिम समय तक सेवा करता रहा। हम आठ भाई-एक बहन थे। तीन भाई एक बहन का स्वर्गवास हो चुका है। 1983–84 की बात होगी, तब मेरा कांशीराम साहब से परिचय हुआ। इसके बाद भी मैं राजनीति के लिए सीरियस नहीं था। अपने काम में लग गया। मैं कभी-कभी बसपा के प्रोग्रामों में चला जाता था, लेकिन सक्रिय बिल्कुल नहीं था। फिर 1989 से मैं सक्रिय हुआ। सवाल: आपको बसपा में मिनी सीएम कहा जाता था। संगठन-सरकार के लिहाज से कई काम किए। कोई ऐसी यादगार बात जो आपको राजनीतिक रूप से बहुत प्रभावित करती हो और आज भी याद हो? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: 1991 में मैं एमएलए बना। कांशीराम साहब इटावा सीट से एमपी का बाय-इलेक्शन जीते थे। कांशीराम साहब ने सहारनपुर से साइकिल रैली निकाली। मैं भी उनके साथ था। हम लोग चलते–चलते फतेहपुर पहुंचे। पुराने जीटी रोड के सामने वाले पीडब्ल्यूडी के गेस्ट हाउस रुके थे। एक बड़े कमरे में कांशीराम साहब सो गए। उसके बगल में छोटे कमरे में मैं सो गया। रात लगभग 2:00 बजे मैं बाथरूम के लिए उठा। तो मुझे कांशीराम साहब के बार-बार खांसने की आवाज आ रही थी। काफी देर बैठा रहा। दिल नहीं माना तो दरवाजा खटखटा कर अंदर गया। कहा साहब आपको नींद नहीं आ रही। बोले हां मुझे नींद नहीं आ रही। मैंने कहा क्या तबीयत ठीक नहीं? बोले हां मेरी तबीयत ठीक नहीं। मैंने कहा- साहब दवा है तो खा लीजिए। बोले दवा नहीं। मैंने कहा तो मुझे बताइए मैं किसी डिस्पेंसरी में जाकर या किसी मेडिकल स्टोर में जाकर ढूंढ करके दवा लाता हूं। उन्होंने कहा- दवा नहीं मिलेगी। मैंने कहा मैं ले आऊंगा। उन्होंने कहा इधर आ-बैठ जा। पहले समझ ले मर्ज क्या है? फिर बोले मेरा मर्ज यह है कि रोज रात में 2 बजे नींद टूट जाती है और फिर पूरी रात मुझे नींद नहीं आती। मैं सिर्फ यह सोचता हूं कि जो ये शोषित और दबा-कुचला समाज है इसको हुक्मरान क्या मैं अपने जीते जी बना पाऊंगा। क्योंकि बाबा साहब डॉ. अंबेडकर पूरी जिंदगी लगे रहे और दुनिया छोड़कर चले गए, लेकिन हुक्मरान नहीं बना पाए। यह मेरा मर्ज है जा दवा मिले, तो ले आ। कांशीराम जी की बात से मैं इतना प्रभावित हुआ कि खड़े-खड़े आंसू निकल आए। इस घटना ने मेरे ऊपर गहरी छाप डाली कि अगर कांशीराम साहब इतना कर सकते हैं तो अगर मैं उनका 1% कर लूं तो ये जो हमारा मिशन है, जिसको हम बहुजन समाज पार्टी कहते थे, वो कहां तक पहुंच सकता है। सवाल : बसपा 2007 में अपने दम पर बहुमत में आई थी। क्या कारण रहा कि इसके बाद लगातार पार्टी के वोट प्रतिशत में गिरावट आती गई? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: बहुत सी कमियां होती हैं। पब्लिक अपना टेस्ट भी बदलती है। कई बार इससे पहले हुआ था कि पहले सपा की सरकार फिर बीच में भाजपा की सरकार बन गई। फिर सपा की बन गई। सपा के बाद हमारी (बसपा) बनी, जो 2003 तक रही। फिर मुलायम सिंह की सरकार 2003 से 2007 तक बन गई। 2007 में हमारी (बसपा) बन गई। मुझे इसकी एक-दो वजह नहीं बल्कि कई वजहें लगती हैं। उन कमियों, जब हम या कोई और सत्ता में रहता है, तब लोग नहीं बताते हैं। सवाल : कांग्रेस में 8 साल रहे। कांग्रेस में कहां कमी रह गई? उसका संगठन क्यों नहीं मजबूत हो पा रहा है? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: अब मजबूत करने वाले कर रहे हैं। संगठन खड़ा करने का प्रयास भी हो रहा है। असर नहीं दिख रहा तो सीधी सी बात ये है कि चुनाव लड़ना कोई युद्ध नहीं है। लेकिन ये दस्तूर रहा है कि एक ही रण कौशल से आप युद्ध करेंगे तो आप लगातार कामयाब हो सकते हैं, लेकिन एक ना एक दिन हमारा विरोधी उसकी काट ढूंढ ही लेगा। इसीलिए हमें समय–समय पर अपने रण कौशल को चेंज करते रहना चाहिए। मैं समझता हूं हमारे विरोधी यानी कांग्रेस के विरोधी ने उसकी काट ढूंढ ली और आगे भी निकल गए। हमारा विरोधी (भाजपा) सांप्रदायिक मामलों को लेकर वोट बैंक की राजनीति करता है। सेकुलर दलों को उसकी काट ढूंढनी चाहिए थी। शायद हम अभी ढूंढ नहीं पाए। यह कमी रह गई, जो अभी पूरी हो सकती है। अभी तो यूपी विधानसभा चुनाव में एक साल से ज्यादा वक्त है। सवाल: आप एक संकेत तो दे ही सकते हैं कि खुद की पार्टी बनाएंगे या किसी समान विचारधारा वाली किसी पार्टी में जाएंगे? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: दोनों संभावनाओं पर विचार चल रहा है। हालांकि मेरा उद्देश्य कांग्रेस को कमजोर करना नहीं है। मैं न तो कांग्रेस के किसी नेता के खिलाफ हूं। और न ही पार्टी के खिलाफ हूं। पार्टी छोड़ देना अलग बात है। विरोध करना एक अलग बात है। पूरे प्रदेश में हमारे लोग हैं, जो कह रहे हैं कि आप जो भी फैसला लेंगे उसके लिए हम तैयार हैं। अगर उन्होंने मेरे ऊपर विश्वास किया है, तो मेरी भी जिम्मेदारी है कि मैं उनके दिल की बात सुनूं। इसके लिए मैं लगातार अलग–अलग जिले में उनके बीच जा रहा हूं। 4 फरवरी के बाद मैं बता दूंगा कि मेरा अगला सियासी कदम क्या होगा? सवाल : भाजपा को हराने के लिए क्या 2027 में एक बड़ा महागठबंधन बनेगा, जिसमें अलग–अलग पार्टियों के साथ आप भी शामिल होंगे? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: भाजपा से मेरी दुश्मनी नहीं, उसकी विचारधारा से है। मेरी हर उस व्यक्ति, उस समाज, उस संगठन से बुराई है जो समाज को तोड़ने का काम करे। मैं तो भाईचारे की बात करता हूं। कोई भी धर्म जो मानवता की बात करता है। इंसानियत की बात करता है। व्यक्ति गलत हो सकता है, लेकिन उसको वोट की राजनीति से देखना, इसे लेकर मेरा विरोध है। सवाल : यूजीसी और प्रयागराज में शंकराचार्य का अपमान हुआ। इसी तरह ब्राह्मण विधायकों की बैठक पर भी राजनीति हुई। इन घटनाक्रमों को कैसे देखते हैं? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: देखिए जब बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो हिंदू–मुसलमान सभी ने माना। यूजीसी मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्टे कर दिया। हां, सरकार को कोई ऐसा फैसला नहीं लेना चाहिए, जिससे किसी का अपमान हो। शंकराचार्य तो बहुत बड़ी बात हो गई। आजकल सांप्रदायिक ताकतों के इशारों पर एक ट्रेंड चल रहा है। पहले मॉब लिंचिंग के नाम पे मुसलमानों के ऊपर अटैक हुआ। मस्जिदों में झंडे लग गए। इन्होंने सोचा हिंदू खुश हो जाएगा, लेकिन सब नहीं। मेरा मानना है कि 0.1% ही ऐसे लोग होते हैं जो खुश होते होंगे। ऐसा सब समाज में होता है। पहले मुसलमानों को ठिकाने लगा दिया। अब ओबीसी का नंबर लगाया। अभी मेरठ का ताजा मामला है वहां मां–बेटी के साथ क्या हुआ। इससे पहले हाथरस में क्या हुआ था? सोनभद्र में क्या हुआ था? एक दो नहीं है। लाखों ऐसे मामले हैं। मुसलमानों के बाद ओबीसी फिर आदिवासी और दलित सभी की लाइन लगी है। मैं सीधा सा कहता हूं कि इस देश के लिए सभी ने कुर्बानी दी है। देश एक तरीके का गुलदस्ता है। उसमें हर तरीके के फूल है। लेकिन ये जाति–सम्प्रदाय के नाम पर सबको ठोक रहे हैं। सवाल: लंबे वक्त तक अलग-अलग पार्टियां सत्ता में रहीं, लेकिन मुस्लिमों की हालत क्यों नहीं सुधरी? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: एक शायर ने बहुत पहले लिखा था– “खुदा उस कौम की कभी हालत नहीं बदलता जिसे ना खुद की फिक्र हो ना अपने हालत बदलने की।” सियासी सुर में मुसलमान कहां है? यह कौम सियासत में है ही नहीं। राजनीति का मतलब गंदी राजनीति नहीं है। राजनीति का मतलब हिंदू–मुस्लिम के नाम पर वोट लेना भी नहीं है। राजनीति तो हमारे बड़े-बड़े पैगंबरों ने भी की। इस्लाम में दाखिल है राजनीति। मेरा मानना है बिना संघर्ष के कुछ नहीं होगा। किसी महापुरुष को उठा के देख लें। हमारे पीर–पैगंबरों को देख लें। और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को देख लें। वो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम तब बने जब 14 वर्ष का वनवास पूरा किया। वनवास के लिए निकले थे, तो सिर्फ राजकुमार और दशरथ–पुत्र थे। अयोध्या के युवराज थे। 14 वर्ष का वनवास काटा और इसके बाद रावण का वध किया। वहां असत्य पर सत्य की विजय की। जब लौट के आए तो मर्यादा पुरुषोत्तम बने। जब भगवान को भी ये सब करना पड़ा है, पैगंबरों को करना पड़ा है। फिर बिना संघर्ष के कुछ नहीं मिला। मुझे एक भी काम बताओ जो आराम से होता है। सवाल : सरकार ने वक्फ संशोधन बिल पेश किया था। पास भी हो गया था। उसका काफी विरोध हुआ था। सरकार को उसमें क्या सुधार करना चाहिए? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: मेरा मानना है कि सबका क्रम से नंबर लगा है। मैंने जैसे जाति वाइज बताया। वैसे ही ये वक्फ बिल भी है। अभी यूपी सरकार एक बिल लेकर आई है, जिसमें नजूल की जमीनों को छीनकर उद्योगपतियों को दिया जाएगा। वक्फ बिल सिर्फ उन जमीनों पे कब्जा करना है, जिसके बहुत से मालिकाना हक रखने वाले लोग पाकिस्तान चले गए। कुछ मरने से पहले मस्जिदों और कब्रिस्तानों के नाम दे गए थे। ये उस पर कब्जा करने की बुरी नियत है। सारा कुछ तो आपने बेच डाला। रेलवे बेच डाला। सिविल एविएशन बेच डाला। ट्रांसपोर्ट बेच डाला। पावर ऊर्जा बेच डाला। हर शहर में 80% लोग नजूल लैंड में रह रहे हैं। वक्फ के बाद अब नजूल की भूमि पर नजर है। शहर की 80% आबादी वाली जगह खाली हो जाएगी। ये बारी-बारी से चल रहा है। आखिर ये हिंदुस्तान के वासियों को रहने देंगे कि नहीं रहने देंगे? ये कौन सी स्ट्रेटजी और कौन सी चाल है? मेरा इनसे निवेदन है कि बाहर आओ भाई। गरीबों को रहने दो। मत करो ऐसा। सवाल: आप अनुभवी नेता हैं और हवा का रुख भांप लेते हैं। 2027 को लेकर क्या सोचते हैं? भाजपा की विदाई होगी या सत्ता में लौटेगी? नसीमुद्दीन सिद्दीकी: देखिए मेरा बस चले तो मैं कल ही विदाई कर दूं। मजबूर हूं। और अगर वो सुधर जाते हैं तो बार-बार सत्ता में लौटे। विधानसभा का रिजल्ट मार्च 2027 में आएगा और अभी फरवरी 2026 चल रहा है। लगभग एक साल का वक्त है। चुनाव में किससे अलायंस होगा। कौन सी पार्टी किसके साथ जाएगी। इसके बाद ही तस्वीर साफ होगी। मैं आज के हिसाब से कहूंगा। फिर उसके बाद समीकरण बदल गए तो। इस कारण अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी।
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ये खबर भी पढ़ें… मंत्री स्वतंत्र से भिड़ने वाले विधायक बोले-अफसर झूठ बोल रहे:सड़कें टूटीं, गांवों में पानी भरा, यूपी विधानसभा में भी मुद्दा उठाया यूपी के महोबा से भाजपा विधायक बृजभूषण राजपूत इन दिनों चर्चा में हैं। बृजभूषण ने 30 जनवरी को मंत्री स्वतंत्र देव सिंह का रास्ता रोक लिया था। अपनी विधानसभा के 100 गांवों में पानी न पहुंचने और पाइपलाइन के लिए खोदी गई सड़कों की मरम्मत न होने पर नाराजगी जताई थी। कहा था- जिले के 90 प्रतिशत गांवों के लोग मुझसे पूछते हैं। मैं क्या जवाब दूं? चरखारी से विधायक बृजभूषण राजपूत आखिर अपनी ही सरकार से क्यों नाराज हैं? अफसरों ने उनकी इतनी ज्यादा नाराजगी क्यों है? पढ़ें पूरी खबर
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