DniNews.Live

Fast. Fresh. Sharp. Relevant News

करतलिया बाबा ने सरयूतट पर रामनाम की अलख जगाई:काशी में गंगा की धारा में 4 दशक तक तप किया, महंत आज देंगे श्रद्धांजलि

अयोध्या सिद्ध संतो की सराय कही जाती है। यहां अनेक सिद्ध भजनानंदी संतों ने अपने त्याग और तपस्या से पूरे देश में रामनाम की अलख जगाई। ऐसे ही एक सिद्ध संत परमपूज्य करतलिया बाबा हुए। पावन सलिला सरयू के तट पर उन्होंने रामनाम की घनेघार साधना कर भगवान की कृपा प्राप्त की। उनकी तपस्थली पर वर्तमान में सिद्ध पीठ श्री करतलिया बाबा आश्रम स्थापित है। करतलिया महाराज का 40 वीं पुण्यतिथि समारोह सोमवार यानी को बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ मनाया जा रहा है। संतों का मानना है कि करतलिया बाबा को याद करना संतत्व के एक युग का स्मरण है। वे आराध्य में लीनता की मिसाल थे। बचपन में ही घर का त्याग कर तीर्थाटन आरंभ कर दिया बिहार प्रांत के सहरसा जिले के ग्राम गोसपुर गोडियारी में पैदा हुए बाबा होश संभालते ही रामभक्ति की ओर उन्मुख हुए। उनकी यह वृत्ति गुरु गरभी दास के स्पर्श से और रोशन हुई। बाल्यावस्था में बाबा ने गृह त्याग कर संतों की जमात के साथ तीर्थाटन शुरू किया। भगवान सीताराम की मूर्ति के सामने हमेशा ताली बजाकर राम राम करते रहते भगवान के सामने करताल बजाते हुए अहर्निश नृत्य के चलते शीघ्र ही वे करतलिया बाबा के नाम से विख्यात हुए। तीर्थाटन के क्रम में करतलिया बाबा काशी पहुंचे और गंगा तट पर धूनी रमाई। यहां बाबा की ख्याति आम से लेकर विशिष्ट लोगों तक पहुंची। करपात्री महराज ने उनकी तपस्या पर मुहर लगाई बाबा से प्रभावित होने वालों में धर्म सम्राट की उपाधि से विभूषित करपात्रीजी जैसे संत भी थे। कुछ दशक तक काशी में अखंड नाम जप में लीन रहने के बाद बाबा दैवीय प्रेरणा से रामनगरी की ओर प्रेरित हुए और सरयू तट पर धूनी रमाई। तत्कालीन अंग्रेज डिप्टी कलेक्टर को भी प्रभावित रहे यहआजादी के पूर्व का दौर था और बाबा की प्रबल भक्ति एवं त्यागवृत्ति ने तत्कालीन अंग्रेज डिप्टी कलेक्टर को भी प्रभावित रहे और उसने खुले आसमान के नीचे तपस्यारत रहने वाले बाबा के लिए एक बड़ी छतरी की व्यवस्था की। यद्यपि बाबा की रुचि आश्रम बनाने में नहीं थी और भजन के अलावा दुनियादारी से उनका सरोकार संतों एवं दीन हीनों की सेवा तक था। इसके बावजूद भक्तों के अति आग्रह पर बाबा ने आश्रम की स्थापना स्वीकार की और यह आश्रम गहन उपासना एवं सेवा के केंद्र के रूप में स्थापित हुआ। वह सन 1987 की फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा की तिथि थी, जब बाबा ने महाप्रयाण का फैसला सुनाया। शोकाकुल भक्तों के बीच बाबा ने शालिग्राम को सिर से लगाया और तुलसीदल एवं सरयू जल का पान करने के साथ सदा-सर्वदा – सर्वदा के के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। उनकी शिष्य परंपरा को आगे बढ़ा रहे करतलिया आश्रम के वर्तमान पीठाधीश्वर महंत बालयोगी रामदास महाराज के अनुसार बाबा भले ही स्थूलतः हमारे बीच न हों पर उनकी साधना सिद्धि की तरंगें अभी भी आश्रम में व्याप्त हैं और एक बड़े आध्यात्मिक परिकर को बराबर प्रेरित करती हैं। इस समारोह में आश्रम से जुड़े हुए पूरे भारत से शिष्य-परिकर सन्त धर्माचार्य मंदिर में आ गये है। कार्यकम के प्रथम दिवस आज मंदिर में विशाल कंबल वितरण किया गया। करतलिया बाबा की पुण्य स्मृति समारोह में रविवार को अंखड़ पाठ का शुरू हुआ। वही देर शाम मां सरयू की 5100 बत्ती की भव्य आरती होगी। इससे पहले शनिवार से श्रीसीतारामनाम संकीर्तन हो रहा है। जो अनवरत 24 घण्टे आठों पहर तक चला। कार्यक्रम में करतलिया बाबा से जुड़े शिष्य परिकर सहित पूरे देश से संत साधक मौजूद हैं।


https://ift.tt/dp5zNS7

🔗 Source:

Visit Original Article

📰 Curated by:

DNI News Live

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *