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अब रटना हुआ पुराना, खेल बना पढ़ाई का बहाना:गीता यादव ने ‘पाठ पढ़ाओ, खेल खिलाओ’ से बढ़ाई बच्चों की एकाग्रता

शिक्षा का मतलब सिर्फ ब्लैकबोर्ड पर लिखे शब्दों को कॉपी में उतारना नहीं है, बल्कि बच्चों के भीतर सीखने की ललक पैदा करना है। कानपुर नगर के घाटमपुर ब्लॉक स्थित प्राथमिक विद्यालय ललकीपुरवा की प्रधानाध्यापिका गीता यादव ने इसी फलसफे को हकीकत में बदल दिया है। उन्होंने एक ऐसा अनोखा तरीका निकाला है जिससे बच्चे अब पढ़ाई को बोझ नहीं, बल्कि एक मजेदार खेल समझने लगे हैं। उनके इस इनोवेशन का नाम है’पाठ पढ़ाओ, खेल खिलाओ, सब समझ जाओ’। एकाग्रता की समस्या और गीता का समाधान अक्सर सरकारी स्कूलों में यह चुनौती देखी जाती है कि एक ही कक्षा में अलग-अलग मानसिक स्तर के बच्चे होते हैं। कुछ बच्चे बहुत तेज होते हैं, तो कुछ ऐसे भी होते हैं जिनका मन पढ़ाई में ज्यादा देर टिक नहीं पाता। गीता यादव ने महसूस किया कि उनके स्कूल में भी बच्चों के बीच एकाग्रता यानी ‘कंसंट्रेशन’ की काफी कमी है। शुरुआत में उन्होंने योग और ध्यान (Meditation) का सहारा लिया। लेकिन समस्या यह थी कि बच्चे उतनी ही देर शांत रहते थे जितनी देर योग चलता था, उसके बाद उनका ध्यान फिर भटक जाता था। जब खेल बना पढ़ाई का साथी गीता जी को समझ आ गया था कि बच्चों को बांधकर नहीं रखा जा सकता, उन्हें उनके ही अंदाज में सिखाना होगा। यहीं से जन्म हुआ उनके नवाचार का। उन्होंने पढ़ाई के बीच में ही ऐसे छोटे-छोटे खेल शामिल किए जो न केवल मनोरंजन करते हैं, बल्कि बच्चों की सीखने की क्षमता को भी बढ़ाते हैं। इस ‘पाठ पढ़ाओ, खेल खिलाओ’ तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जो बच्चा पहले क्लास में शांत या खोया-खोया रहता था, वह अब खेल के चक्कर में पूरे पाठ को ध्यान से सुनने लगा है। बच्चों को इस तरह से मिल रहा है फायदा
इस नवाचार ने क्लासरूम के माहौल को पूरी तरह बदल दिया है। अब बच्चे इस डर में नहीं रहते कि शिक्षक उनसे क्या पूछेंगे, बल्कि वे इस उत्साह में रहते हैं कि आज कौन सा नया खेल खेला जाएगा। इससे बच्चों की तार्किक क्षमता बढ़ रही है और वे मुश्किल से मुश्किल टॉपिक को भी खेल की यादों के जरिए आसानी से समझ लेते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि खेल के दौरान बच्चों के बीच आपसी तालमेल और आत्मविश्वास भी बढ़ रहा है।
एक नई उम्मीद की किरण
गीता यादव का यह प्रयास उन सभी शिक्षकों के लिए एक मिसाल है जो संसाधनों की कमी का रोना रोने के बजाय अपनी रचनात्मकता से बदलाव लाना चाहते हैं। ललकीपुरवा के इस छोटे से स्कूल से निकली यह गूंज अब दूर-तक सुनाई दे रही है। यह नवाचार साबित करता है कि अगर पढ़ाने का अंदाज दिलचस्प हो, तो हर बच्चा जीनियस बन सकता है। अब यहाँ के बच्चे सिर्फ पढ़ते नहीं हैं, बल्कि खेल-खेल में भविष्य की नई इबारत लिख रहे हैं।


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