समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक्स पर दो अलग-अलग पोस्ट के माध्यम से भाजपा पर निशाना साधा है। पहली पोस्ट में भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील को उन्होंने समर्पण बताया है। उन्होंने जनता के हवाले से लिखा है कि डील एक तरफ़ा नहीं होती है। अमेरिकी उत्पाद पर 0 ट्रैरिफ और भारतीय उत्पाद पर 18 प्रतिशत के टैरिफ का हवाला देते हुए पूछा है कि 0 बड़ा या 18? उन्होंने आग लिखा कि देश के किसानों, दुकानों, उद्योगों को बचाने के लिए, खोखले शब्दों के अलावा भाजपा के पास कोई और सुरक्षा-कवच या संरक्षण-योजना है? उन्होंने सवाल किया कि भारत के हितों के आत्मसमर्पण की मजबूरी के पीछे छिपा गहरा राज़ क्या है? क्या ये ‘बनी वहाँ, पहुँची यहाँ’ जैसा कोई एक पक्षीय मामला है? क्या डील के नाम पर भाजपा सरकार ‘डॉटेड लाइन’ पर केवल हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य है? डील से खेती को खतरा
अपने एक बयान में अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा सरकार ने देश के सामने खतरा पैदा कर दिया है। सरकार ने अमेरिका को पांच सौ बिलियन डालर का व्यापार दे दिया है। खेती-बाड़ी दे दी। भाजपा देश का बाजार और अर्थव्यवस्था दूसरे देशों के हाथों में दे रही है। इससे हमारा किसान बर्बाद हो जाएगा। खेती खतरे में पड़ जाएगी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जी को कोई खतरा नहीं है। खतरा भाजपा ने देश के किसानों के सामने खड़ा कर दिया है। विवादित फिल्म को बताया भाजपा की साजिश एक अन्य पोस्ट में उन्होंने घूसखोर पंडत फिल्म को लेकर हो रहे विवाद पर भाजपा पर तंज कसा है और भाजपा पर साजिश का आरोप लगाया है। पोस्ट में लिखा है…भाजपा हमेशा से ये षड्यंत्र करती है कि वो किसी समाज के कुछ लोगों का दुरुपयोग, उसी समाज के ख़िलाफ़ करती है। इससे वो किसी समाज विशेष को लक्षित, चिन्हित, टारगेट करके ‘अपमानित-आरोपित’ करती है। भाजपा कभी ये काम बयानबाज़ी से करती है और कभी बैठकों पर नोटिस देकर, कभी अपना पैसा लगाकर विज्ञापन, प्रचार सामग्री या फ़िल्म बनवाकर। और जब विवाद बढ़ जाता है तो गिरगिट की तरह रंग बदलकर घड़ियाली आँसू बहाती है और दिखावे के लिए सामने आकर झूठी कार्रवाई का नाटक करती है। सच तो ये है कि वो टारगेट किये हुए समाज विशेष को अपमानित-उत्पीड़ित देखकर मन-ही-मन बहुत ख़ुश होती है। वर्तमान में जो फ़िल्मी मुद्दा है उसका नाम से उल्लेख करना संभव नहीं है क्योंकि फ़िल्म का शीर्षक केवल आपत्तिजनक नहीं, बेहद अपमानजनक भी है। उस फ़िल्म का नाम लिखने से भाजपा का उस समाज का तिरस्कार करने का उद्देश्य और भी अधिक पूरा होगा। ऐसा सिनेमा नाम बदलकर भी रिलीज़ नहीं होना चाहिए। जब निर्माताओं को आर्थिक हानि होगी, तभी ऐसी फ़िल्में बनना बंद होंगी क्योंकि पैसे के लालच में भाजपा का एजेंडा चलानेवाले भी भाजपाइयों की तरह पैसे को छोड़कर किसी और के सगे नहीं हैं। जो किसी की भावना का आहत करे वो मनोरंजन कैसे? अखिलेश ने अपनी पोस्ट में लिखा कि ये ‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ या ‘क्रिएटिव लिबर्टी’ के हनन की बात नहीं है, ये ‘रचनात्मक समझ’ या कहिए ‘क्रिएटिव प्रुडेंस’ की बात है कि पूर्वाग्रह से ग्रसित है। जो फ़िल्म किसी एक पक्ष की भावनाओं को, एक सोची-समझी साज़िश के तहत आहत करे वो मनोरंजन कैसे हो सकता है? अगर उद्देश्य मनोरंजन नहीं है तो किसी एक समाज को बदनाम करने के एजेंडे के पीछे के एजेंडे का खुलासा भी होना ही चाहिए। इसका भी भंडाफोड़ होना चाहिए कि इसके पीछे कौन है और कोई क्यों अपना पैसा और दिमाग़ ऐसे सामाजिक एकता विरोधी विध्वंसकारी काम में लगा रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तभी स्वीकार्य जब किसी की प्रतिष्ठा का हनन न हो ‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ अगर जान-बूझकर किसी और के मान-सम्मान का हनन करती है तो उस दुराग्रह भरी रचनात्मकता पर पूर्ण पाबंदी लगाना, रचनात्मकता का हनन नहीं हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तभी तक स्वीकार्य होती है जब तक वो किसी अन्य की गरिमा-प्रतिष्ठा का हनन नहीं करती है। सिनेमा को समाज का दर्पण समझा जाता है लेकिन ये दर्पण मैला और मलिन नहीं होना चाहिए।
https://ift.tt/Q05AHl4
🔗 Source:
Visit Original Article
📰 Curated by:
DNI News Live

Leave a Reply