संभल की उपनगरी सरायतरीन स्थित मदरसा फ़ैज़-उल-उलूम में सोमवार को वार्षिक ‘तहफ्फुज-ए-इस्लाम’ कॉन्फ्रेंस और दस्तारबंदी समारोह संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में क्षेत्र के उलेमा-ए-किराम, गणमान्य नागरिकों और बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने भाग लिया। कॉन्फ्रेंस का आग़ाज़ तिलावत-ए-क़ुरान-ए-पाक से हुआ। इसके बाद हम्द और नात शरीफ़ पेश की गईं। मशहूर नातख़्वां मौलाना ग़ुलाम नबी फ़ैज़ी ने नात-ए-रसूल ﷺ प्रस्तुत की। मुफ्ती मोहम्मद आकिल मिस्बाही ने इस्लाम में इल्म (ज्ञान) की अहमियत पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इल्म हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है। मुफ्ती मिस्बाही ने क़ुरान और हदीस का हवाला देते हुए बताया कि क़ुरान की पहली आयत ‘इक़रा’ (पढ़ो) से शुरू होती है, जो तालीम के महत्व को दर्शाती है। उन्होंने ज़ोर दिया कि सच्चा इल्म वही है जो इंसान को अपने रब की पहचान कराए और समाज में इंसानियत, अमन और भाईचारे का पैग़ाम दे। विशिष्ट अतिथि मौलाना तौसीफ़ मिस्बाही ने मदरसों की अहम भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि मदरसे केवल दीनी तालीम के केंद्र नहीं हैं, बल्कि बच्चों के अख़लाक़ (नैतिकता) और किरदार (चरित्र) के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। मौलाना मिस्बाही ने पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ की सीरत (जीवन शैली) पर अमल करने की अपील की। जलसे का मुख्य आकर्षण उन छात्रों की दस्तारबंदी (पगड़ी बांधने की रस्म) रही, जिन्होंने अपनी दीनी तालीम पूरी की। उलेमा-ए-किराम ने छात्रों के सिर पर दस्तार बांधकर उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए दुआएं दीं। कार्यक्रम का समापन सलात-ओ-सलाम और देश में अमन-ओ-चैन की दुआ के साथ हुआ। जलसे की अध्यक्षता मुफ्ती मुहम्मद महबूब मिस्बाही ने की, और संचालन मौलाना ज़ैग़म रज़ा बरकाती ने किया। इस अवसर पर मदरसा प्रबंधक कलीम अशरफ़ सलामी सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
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