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फर्जी डिग्री के लिए लेते थे हाईस्कूल-इंटर की मार्कशीट:लखनऊ में नंबर बढ़ाकर जारी करते थे सर्टिफिकेट, 25 राज्यों में नेटवर्क

लखनऊ में फर्जी मार्कशीट और डिग्री रैकेट का खुलासा होने के बाद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। पुलिस जांच में पता चला है कि आरोपी केवल डिग्री बेचते नहीं थे, बल्कि छात्र-छात्राओं को उनकी जरूरत के मुताबिक फर्जी मार्कशीट तैयार करके देते थे। पुलिस के अनुसार, गिरोह पहले छात्रों की इंटर और हाईस्कूल की असली मार्कशीट लेता था। इसके बाद उसी पैटर्न पर सेकेंड डिवीजन, फर्स्ट डिवीजन या ज्यादा नंबरों के साथ वैसी ही फर्जी ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन पीएचडी की मार्कशीट और डिग्री तैयार की जाती थी, ताकि बोर्ड और यूनिवर्सिटी का रजिस्ट्रेशन नम्बर और दूसरी डिटेल सेम होने से किसी को शक न हो। आरोपी छात्रों को डिग्री देने से पहले फर्जी ऑनलाइन एग्जाम भी कराते थे। इससे छात्रों को लगता था कि प्रक्रिया वैध है। निजी ऑनलाइन एग्जाम सेंटर किराए पर लेकर फर्जी परीक्षा भी कराई जाती थी। 25 यूनिवर्सिटी, 15 हजार से 4 लाख तक रेट गिरोह देश की करीब 25 नामी-गिरामी यूनिवर्सिटियों की फर्जी डिग्रियां बनाता था। बीए, एमए, बीटेक, बीसीए, एमसीए, एमबीए से लेकर पीएचडी तक की डिग्रियां 15 हजार से 4 लाख रुपए में बेची जाती थीं। डिग्री की कीमत यूनिवर्सिटी और कोर्स के हिसाब से तय होती थी। पूछताछ में यह भी सामने आया है कि लखनऊ में 6 से ज्यादा लोग इस नेटवर्क से जुड़े हो सकते हैं। उनकी पहचान कर जल्द कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि गिरोह के दूसरे सदस्यों की गिरफ्तारी के लिए मुखबिरों को सक्रिय किया गया है। दिल्ली-मुंबई से लेकर मध्य प्रदेश तक फैला जाल जांच में खुलासा हुआ है कि गिरोह ने उत्तर प्रदेश के अलावा दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर राज्यों तक अपना नेटवर्क फैला रखा था। जरूरतमंद युवाओं को बिना पढ़ाई और मेहनत के डिग्री दिलाने का लालच देकर उन्हें फंसाया जाता था। कई मामलों में प्रतीकात्मक परीक्षा भी कराई जाती थी, ताकि फर्जीवाड़े पर शक न हो। पीएचडी से लेकर बीटेक तक की डिग्री गिरोह पीएचडी, बीटेक, बीसीए, एमसीए, एमबीए, एमएससी, बीए और एमए जैसी डिग्रियां तैयार करता था। अलग-अलग कोर्स और विश्वविद्यालय के नाम पर कीमत तय होती थी। साधारण डिग्री 25 हजार रुपए में तो वहीं प्रोफेशनल और उच्च डिग्रियां 4 लाख रुपए तक में बेची जाती थीं। 2021 से अब तक 15 करोड़ के अवैध कारोबार का अनुमान पुलिस का आकलन है कि गिरोह वर्ष 2021 से सक्रिय था। अब तक करीब 1500 से अधिक लोगों को फर्जी डिग्रियां बेच चुका है। इस अवैध कारोबार का कुल टर्नओवर लगभग 15 करोड़ रुपए आंका जा रहा है। बरामद डिग्रियों और दस्तावेजों से साफ है कि यह रैकेट लंबे समय से योजनाबद्ध तरीके से चल रहा था। 25 यूनिवर्सिटी के नाम पर तैयार होती थीं डिग्रियां छापेमारी में 25 अलग-अलग विश्वविद्यालयों की 923 फर्जी डिग्रियां और मार्कशीट बरामद हुई हैं। इसके साथ ही 15 विश्वविद्यालयों की कूटरचित मुहरें, विशेष पेपर, लैपटॉप, हार्ड डिस्क, प्रिंटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी मिले हैं। पूछताछ में सामने आया है कि फर्जी डिग्री लेने वाले कई लोग निजी कंपनियों में नौकरी हासिल कर चुके थे। पुलिस अब ऐसे लोगों की सूची तैयार कर रही है, ताकि फर्जी डिग्री के आधार पर नौकरी करने वालों पर भी कार्रवाई की जा सके। अब जानिए पूरा मामला… लखनऊ पुलिस ने 21 दिसंबर को गोमती नगर के एक कैफे में फर्जी डिग्री बनाने जाने का भंडाफोड़ किया। पुलिस ने तीन आरोपियों पूराकलंदर अयोध्या के रहने वाले सत्येंद्र द्विवेदी (32), बीघापुर उन्नाव के रहने वाले अखिलेश कुमार (44) और ईसानगर लखीमपुर खीरी के रहने वाले सौरभ शर्मा (35) को गिरफ्तार किया। आरोपियों के पास से 25 यूनिवर्सिटी की 923 फर्जी डिग्री मिली हैं। 15 अलग-अलग यूनिवर्सिटी की मोहरें, 65 डिग्री बनाने वाला पेपर और 6 लैपटॉप सहित डिग्री बनाने का सामान मिला। पुलिस की पूछताछ में आया कि सत्येंद्र द्विवेदी गिरोह का सरगना है।


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