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जौनपुर में संकष्टी गणेश चतुर्थी मनाई गई:माघ कृष्णचतुर्थी पर सर्वार्थ अमृत सिद्ध योग में हुआ पूजन

जौनपुर में माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर संकष्टी गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया गया। मंगलवार देर रात व्रती माताओं ने यह व्रत रखा। यह व्रत प्रीति योग में सर्वार्थ अमृत सिद्ध योग के संयोग में संपन्न हुआ।मंगलवार रात चंद्रोदय 8:45बजे से9:30 बजे तक रहा। इस दौरान व्रती माताओं ने चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया। हालांकि, जौनपुर जनपद में घने बादल छाए रहने के कारण चंद्र दर्शन में बाधा आई। चंद्रमा के दर्शन न होने पर कई लोगों ने अन्य प्रदेशों में रहने वाले अपने रिश्तेदारों के माध्यम से मोबाइल फोन पर वीडियो कॉल के जरिए चंद्र दर्शन कर पूजा-अर्चना की।विद्वान ज्योतिषाचार्य डॉ.अखिलेश मिश्रा ने व्रत के महत्व के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस दिन व्रती महिलाएं दिनभर उपवास रखती हैं। चंद्रोदय से पूर्व स्नान कर नए वस्त्र धारण किए जाते हैं।खुले आसमान के नीचे गोबर से लीपकर चौक पूरा जाता है, जहां पूजन की सभी वस्तुएं रखी जाती हैं।मान्यता है कि इस व्रत के करने से संकटों से मुक्ति मिलती है। महिलाएं अपने पुत्रों की दीर्घायु, परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल कामना के लिए यह व्रत रखती हैं। यह व्रत विघ्न-बाधाओं का निवारण करता है और परिवार में धन-धान्य व ऐश्वर्य में वृद्धि करता है।चंद्रोदय के पश्चात चंद्रमा को लाल चंदन, कुश, दूर्वा, फूल, अक्षत और शमी पत्र आदि के साथ तांबे के पात्र से अर्घ्य दिया जाता है। इस व्रत में गौर गणेश और चंद्रमा का विशेष पूजन किया जाता है। पूजन में भगवान गणपति को प्रत्येक वस्तु चार की संख्या में चढ़ाई जाती है, जिसमें लाल कंद, फल, गुड़, तिल्ली, पान और तिल शामिल हैं। गुड़, तिल और घृत की आहुति भी दी जाती है।चार बत्तियों वाले दीपक के साथ गणेश आरती की जाती है और गणेश जी की चार कथाएं कही व सुनी जाती हैं। काले तिल, जल और फूल को हाथ में लेकर चार बार प्रदक्षिणा करते हुए अर्घ्य देने का विधान है। व्रत में गुड़, काली तिल और लाल कंद (मूली), पान के पत्ते का विशेष महत्व बताया गया है। पूजन के पश्चात सिंघाड़े का हलवा, कंद, दूध और चाय आदि का फलाहार किया जाता है।


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