लखनऊ बेंच ने राजनीतिक दलों द्वारा जातीय रैलियों के खिलाफ दायर जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मौजूदा कानून के तहत किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल को केवल जाति या धर्म के आधार पर मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए चुनाव लड़ने से पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति एके चौधरी की खंडपीठ ने स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव द्वारा वर्ष 2013 में दायर जनहित याचिका पर पारित किया। न्यायालय ने याचिका पर विस्तृत निर्णय दिया। विषय पूरी तरह से विधायिका के क्षेत्राधिकार में अदालत ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8-ए ही एकमात्र प्रावधान है, जिसके तहत चुनावी कदाचार के मामलों में अयोग्य ठहराया जा सकता है, वह भी तब जब संबंधित व्यक्ति को दोषी ठहराया जा चुका हो। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति पर चुनाव से पहले प्रतिबंध लगाने का अधिकार वर्तमान कानून में उपलब्ध नहीं है। यह विषय पूरी तरह से विधायिका के क्षेत्राधिकार में आता है। राजनीतिक दल का पंजीकरण समाप्त करने का अधिकार नहीं न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयोग को भी किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण समाप्त करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। यह अधिकार केवल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सीमित परिस्थितियों में ही लागू होता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल की मान्यता को चुनाव चिन्ह (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 16-ए के तहत निलंबित या वापस लिया जा सकता है, लेकिन इसमें नए प्रावधान जोड़ने का अधिकार केवल विधायिका को है। शिक्षा प्रणाली में सही मूल्यों का संचार आवश्यक न्यायालय ने अपने निर्णय में एक व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि जाति और धर्म आधारित संकीर्ण सोच का स्थायी समाधान केवल कानूनों के माध्यम से संभव नहीं है। इसके लिए परिवार और शिक्षा प्रणाली में सही मूल्यों का संचार आवश्यक है।
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