कुशीनगर जनपद की ऐतिहासिक छितौनी चीनी मिल का मामला एक बार फिर चर्चा में है। मिल के पूर्व निदेशक संजय कुमार तुलस्यान ने उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त से शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया है कि उनके द्वारा की गई शिकायत पर अब तक न तो निष्पक्ष जांच हुई है और न ही पूरा सच सामने आया है। उन्होंने यह भी कहा कि उनसे जमा कराई गई प्रतिभूति राशि वापस करने के लिए बैंक खर्चों का विवरण मांगना पूरी तरह अनुचित है। शिकायत में बताया गया है कि वर्ष 1934 में स्थापित छितौनी चीनी मिल को तत्कालीन बसपा सरकार के कार्यकाल में बेचा गया था। आरोप है कि उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम लिमिटेड, लखनऊ के माध्यम से वर्ष 2011 में इस मिल को बिना खुली निविदा (ओपन टेंडर) के मात्र 3.60 करोड़ रुपये में बेच दिया गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि यह बिक्री प्रक्रिया नियमों के खिलाफ थी, जिससे सरकार को भारी राजस्व नुकसान हुआ। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अन्य चीनी मिलों के साथ-साथ छितौनी चीनी मिल में भी कथित घोटाले की जांच शुरू की थी। जांच के दौरान ईडी ने मिल को सील कर दिया था और जांच पूरी होने तक इसकी देखरेख जिला प्रशासन को सौंप दी गई थी। इसके बावजूद आरोप है कि प्रशासनिक मिलीभगत के चलते मिल की मशीनरी और अन्य कीमती सामान चोरी-छिपे ट्रकों के माध्यम से बाहर भेजकर बेच दिए गए। शिकायतकर्ता संजय कुमार तुलस्यान ने यह भी बताया कि इस पूरे मामले को लेकर वर्ष 2015 में हनुमानगंज थाने में एक एफआईआर दर्ज कराई गई थी, लेकिन आज तक कथित दोषियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। उनका आरोप है कि मिल की संपत्ति पर अवैध कब्जा लगातार बना हुआ है, जो न्यायसंगत नहीं है और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े करता है। पूर्व निदेशक ने लोकायुक्त से मांग की है कि पूरे प्रकरण की गहराई से और निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए और चोरी गई सरकारी संपत्ति की क्षतिपूर्ति कराई जाए। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि इस मामले की प्रतिलिपि मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश और जिलाधिकारी कुशीनगर को भी भेजी गई है, ताकि उच्च स्तर पर संज्ञान लिया जा सके। छितौनी चीनी मिल, जो कभी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और रोजगार का बड़ा केंद्र थी, आज अपने अस्तित्व और न्याय की लड़ाई लड़ रही है। अब देखने वाली बात यह होगी कि लोकायुक्त और शासन स्तर पर इस गंभीर मामले में क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं और क्या वर्षों से लंबित इस प्रकरण में पीड़ित पक्ष को न्याय मिल पाता है या नहीं।
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