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चाइनीज मांझे मामले में पुलिस जांच का रास्ता खुला:जौनपुर में अधिवक्ता की याचिका पर CJM के आदेश को चुनौती, कहा- साधारण अपराध नहीं

जौनपुर में प्रतिबंधित चाइनीज मांझे से संबंधित एक मामले में जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने पुलिस जांच का रास्ता खोल दिया है। 5 जनवरी को सत्र न्यायालय ने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार की। यह याचिका मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के उस आदेश को चुनौती देती है, जिसमें गंभीर अपराध की शिकायत को साधारण परिवाद मानकर पुलिस जांच से इनकार कर दिया गया था। यह मामला 13 जनवरी 2025 का है। उस दिन अधिवक्ता आशीष शुक्ला अपने साथी शिवराज यादव उर्फ भैयालाल के साथ मोटरसाइकिल पर न्यायालय से घर लौट रहे थे। शास्त्री पुल के पास वे पतंग उड़ा रहे अज्ञात व्यक्तियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे प्रतिबंधित चाइनीज मांझे में फंस गए। इस घटना में शिवराज यादव के चेहरे और गर्दन पर गंभीर चोटें आईं, और आशीष शुक्ला को भी चोटें लगीं। दोनों अधिवक्ताओं को यश हॉस्पिटल में इलाज कराना पड़ा था। पीड़ितों ने थाना लाइनबाजार में शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की। पुलिस अधीक्षक को आवेदन देने के बावजूद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। लगभग एक वर्ष बाद, उसी स्थान पर एक और घटना हुई। शिक्षक संदीप तिवारी, जो अपनी बेटी को स्कूल छोड़कर घर लौट रहे थे, का गला पतंग के प्रतिबंधित धागे में फंसने से निधन हो गया। अधिवक्ता विकास तिवारी इस पूरे मामले में याचिकाकर्ता का पक्ष रख रहे हैं। सत्र न्यायालय ने अब इस मामले में पुलिस जांच की अनुमति दे दी है। मामले की अगली सुनवाई 12 फरवरी 2026 को निर्धारित की गई है। मजबूर होकर आशीष शुक्ला ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष अपने अधिवक्ता विकास तिवारी के माध्यम से आवेदन दाखिल किया, जिसमें प्राथमिकी दर्ज कर जांच की मांग की गई। लेकिन मजिस्ट्रेट ने इसे परिवाद मान लिया। इसके खिलाफ दाखिल पुनरीक्षण याचिका को अब सत्र न्यायालय ने स्वीकार कर लिया है।यह घटना राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेश की खुली अवहेलना को उजागर करती है। अधिकरण ने वर्ष 2017 में खालिद अशरफ बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट निर्देश दिया था कि पतंग उड़ाने के लिए नायलॉन या किसी अन्य सिंथेटिक सामग्री से बने मांझे, प्लास्टिक के धागे, तात धागा व सीसा लेपित धागा पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा, क्योंकि यह पक्षियों, जानवरों और मनुष्यों के लिए जानलेवा है तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है। आशीष शुक्ला की शिकायत पर पुलिस ने समय रहते कार्रवाई की होती, तो शायद संदीप तिवारी की जान बचाई जा सकती थी। पुलिस की निष्क्रियता ने न केवल पीड़ितों को न्याय से वंचित किया, बल्कि आगे की घटनाओं को भी बढ़ावा दिया।पीड़ित आशीष शुक्ला के अधिवक्ता विकास तिवारी ने कहा कि यह लड़ाई किसी एक की नहीं है, बल्कि हर साल चाइनीज मांझे से घायल होने या मरने वाले सैकड़ों निर्दोष लोगों की आवाज है। न्यायालय का यह फैसला पुलिस को जवाबदेह बनाएगा और प्रतिबंध को सख्ती से लागू करवाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।


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