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कौवों की घटती संख्या पर संरक्षण की मांग:पर्यावरण व सनातन संस्कृति से जुड़ा बताया, कहा- विलुप्त होना सांस्कृतिक परंपराओं के लिए गंभीर

बस्ती जिले में कौवों की घटती संख्या पर पर्यावरण प्रेमियों, राजनीतिक दलों और पत्रकारों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। इसे देखते हुए कौवों को संरक्षित पक्षी का दर्जा देने की मांग जोर पकड़ रही है। विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने इसे पर्यावरण के साथ-साथ भारतीय सनातन संस्कृति से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा बताया है। भाजपा नेता सत्येंद्र सिंह भोलू ने इस विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सनातन संस्कृति में कौवों का विशेष महत्व है। पितृपक्ष और श्राद्ध कर्मों के दौरान कौवों को भोजन कराना पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि कौवों का विलुप्त होना सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी एक गंभीर खतरा है। हिंदू युवा वाहिनी के जिलाध्यक्ष विनय सिंह ने गौरैया के संरक्षण अभियान का उदाहरण देते हुए कौवों को भी संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कौवों की आबादी में तेजी से गिरावट के लिए शहरीकरण, मोबाइल टावरों की बढ़ती संख्या, रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग और भोजन की कमी को मुख्य कारण बताया। वरिष्ठ पत्रकार पुनीत ओझा, भाजपा के वरिष्ठ नेता अजय सिंह गौतम और आशुतोष सिंह ने भी कौवों के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने इसे जनहित से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय बताया। इस संबंध में प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) डॉ. सरीन सिद्दीकी से संपर्क किया गया। उन्होंने बताया कि कौवों के संरक्षण को लेकर शासन को पत्र लिखा जाएगा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान में कौवा संरक्षित पक्षी की श्रेणी में शामिल नहीं है।


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