विदेश मंत्री एस जयशंकर ने IIT मद्रास में आयोजित एक कार्यक्रम में भारत की विदेश नीति, पड़ोसी देशों के साथ संबंधों, राष्ट्रीय सुरक्षा, वैश्विक भू राजनीति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और व्यक्तिगत जीवन के संतुलन को लेकर बेहद स्पष्ट और कठोर रुख सामने रखा। उन्होंने दो टूक कहा है कि भारत दुनिया की उन गिनी चुनी प्राचीन सभ्यताओं में शामिल है जो आधुनिक राष्ट्र के रूप में उभरने में सफल रहीं और यही ऐतिहासिक निरंतरता भारत की वैश्विक पहचान की आधारशिला है।
पड़ोसी देशों संबंधी नीति पर पूछे गए सवाल के जवाब में जयशंकर ने कहा कि भारत को अच्छे और बुरे दोनों तरह के पड़ोसी मिले हैं। पश्चिमी पड़ोसी यानि पाकिस्तान की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई देश जानबूझकर लगातार और बिना किसी पछतावे के आतंकवाद को अपनी नीति बनाए रखता है तो भारत को अपने नागरिकों की रक्षा करने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा कि भारत इस अधिकार का प्रयोग करेगा और यह तय करने का अधिकार केवल भारत का है कि वह कैसे और कब कार्रवाई करेगा। उन्होंने साफ कहा कि कोई बाहरी शक्ति भारत को यह नहीं बता सकती कि उसे क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए।
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जल बंटवारे जैसे समझौतों पर उन्होंने कहा कि अच्छे पड़ोसी संबंध एकतरफा नहीं हो सकते। जयशंकर ने कहा कि यदि दशकों तक आतंकवाद चलता रहे तो अच्छे पड़ोसीपन की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि कोई देश यह नहीं कह सकता कि वह आतंकवाद भी जारी रखे और पानी जैसी साझी सुविधाओं का लाभ भी ले।
बांग्लादेश में हालिया अस्थिरता पर जयशंकर ने बताया कि वह हाल ही में वहां गए थे और पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने कहा कि भारत अपने पड़ोसियों के प्रति स्वभाव से सहयोगी है। जहां भी अच्छे पड़ोसीपन की भावना दिखती है, वहां भारत निवेश करता है, मदद करता है और संसाधन साझा करता है। उन्होंने कहा कि कोविड काल में भारत ने सबसे पहले अपने पड़ोसियों को टीके भेजे। श्रीलंका के आर्थिक संकट के समय भारत ने चार अरब डॉलर का पैकेज देकर उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भारत की वृद्धि एक उठती हुई लहर है जिससे पूरा पड़ोस लाभान्वित होता है।
अरुणाचल प्रदेश से जुड़े एक मामले पर जयशंकर ने स्पष्ट कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है और हमेशा रहेगा। किसी भी तरह की चालबाजी या उत्पीड़न से जमीनी हकीकत नहीं बदलेगी। उन्होंने बताया कि भारत ने हालिया घटना पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है और अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन की मांग की है।
वैश्विक हालात पर बोलते हुए जयशंकर ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में दुनिया ने कई भ्रम टूटते देखे हैं। यह माना जाता था कि लंबे युद्ध अब संभव नहीं हैं लेकिन आज एक युद्ध चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुका है। उन्होंने कहा कि यह भी कहा जाता था कि वैश्विक व्यापार की आपसी निर्भरता किसी बड़े जोखिम को रोक देगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी कारण आज अधिकांश देश अपनी अर्थव्यवस्था, राजनीति और तकनीक को जोखिम मुक्त करने की नीति अपना रहे हैं।
तकनीक पर उन्होंने कहा कि भारत ने 3जी और 4जी बाहर से लिया लेकिन 5जी के समय यह समझ आया कि बाहरी निर्भरता बहुत बड़ा खतरा है। इसी सोच से आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास तेज हुए हैं। उन्होंने कहा कि रक्षा क्षेत्र में निजी उद्यम और नवाचार के लिए खुले दरवाजे इसी नीति का परिणाम हैं।
अपने व्यक्तिगत जीवन पर बात करते हुए जयशंकर ने कहा कि उनके लिए कोई ऑफ डे नहीं होता क्योंकि दुनिया सप्ताहांत में भी चलती रहती है। उन्होंने बताया कि वह संगीत सुनते हैं, किताबें पढ़ते हैं, फिल्में देखते हैं और खेल देखते हैं ताकि जीवन संतुलित बना रहे।
देखा जाये तो एस जयशंकर ने सभ्यता से लेकर सुरक्षा तक और तकनीक से लेकर जीवन शैली तक जिस स्पष्टता से बात रखी है वह बताती है कि भारत किसी भ्रम में नहीं है। पड़ोसी देशों और आतंकवाद पर दिया गया उनका बयान असाधारण रूप से आक्रामक और स्पष्ट है। यह संदेश सिर्फ एक देश के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए है कि भारत अब नैतिक उपदेशों के नाम पर अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। आतंकवाद और सहयोग साथ साथ नहीं चल सकते। यह बात कहने का साहस वही देश कर सकता है जिसे अपनी शक्ति और वैधता का पूरा भरोसा हो।
साथ ही जल बंटवारे जैसे संवेदनशील विषय को आतंकवाद से जोड़ना यह दिखाता है कि भारत अब पुराने समझौतों को भी नई वास्तविकता के आईने में देख रहा है। अच्छे पड़ोसीपन की शर्तें स्पष्ट हैं। यह बयान भविष्य की कूटनीति की दिशा तय करता है जहां भारत भावनाओं से नहीं बल्कि व्यवहार से रिश्ते तय करेगा। इसके अलावा, बांग्लादेश और श्रीलंका का उदाहरण देकर जयशंकर ने यह भी साफ कर दिया कि भारत दंडात्मक शक्ति ही नहीं बल्कि सहायक शक्ति भी है। भारत का पड़ोस नीति मॉडल एकदम स्पष्ट है। जो साथ चलेगा उसे भारत आगे बढ़ायेगा और जो नुकसान पहुंचाएगा उसे भारत बर्दाश्त नहीं करेगा।
बहरहाल, जयशंकर के आज के सभी बयान मिलकर भारत की नई विदेश नीति का घोषणापत्र बन जाते हैं। यह नीति न तो आक्रामक विस्तारवाद की है और न ही आत्मसमर्पण की। यह नीति आत्मविश्वास, न्याय और सामरिक स्पष्टता की है। यह भारत अब अपने हित खुद परिभाषित करता है और उनकी रक्षा खुद करता है। यही इस दौर के भारत की असली पहचान है।
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