अमेरिका के सबसे बड़े कारोबारी संगठन यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स ने इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की है। इससे पहले डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने इस शुल्क को वैध ठहराते हुए कहा था कि राष्ट्रपति को यह अधिकार कानून के तहत प्राप्त है। यह शुल्क सितंबर में राष्ट्रपति ट्रंप के एक आदेश के जरिए लागू किया गया था, जिसका मकसद H-1B वीज़ा सिस्टम में कथित दुरुपयोग को रोकना बताया गया था।
गौरतलब है कि H-1B वीज़ा के जरिए अमेरिकी कंपनियां विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करती हैं, खासकर टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और हेल्थ सेक्टर में। भारत के हजारों प्रोफेशनल्स भी इसी वीज़ा पर अमेरिका में काम करते हैं।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी जिला न्यायाधीश बेरिल हॉवेल ने 23 दिसंबर को दिए फैसले में कहा कि राष्ट्रपति ने कानून के तहत मिले अधिकारों का ही इस्तेमाल किया है। उन्होंने यह भी माना कि शुल्क बढ़ाने में कोई कानूनी खामी नहीं है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अब अपील में सफलता मिलना आसान नहीं होगा। ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस के विश्लेषक मैथ्यू शेटनहेल्म के मुताबिक, जब निचली अदालत ने ही ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला दिया है, तो ऊपरी अदालतों में इसे पलटना मुश्किल होगा।
इस पूरे विवाद के बीच H-1B वीज़ा सिस्टम पहले से ही संकट में है। सोशल मीडिया जांच, वीज़ा स्टैम्पिंग पर नई पाबंदियां और इंटरव्यू में देरी के चलते हजारों प्रोफेशनल्स अमेरिका और अपने देशों के बीच फंसे हुए हैं। कई कंपनियों ने कर्मचारियों को विदेश यात्रा से बचने की सलाह भी दी है।
गौरतलब है कि इस शुल्क के खिलाफ अमेरिका के कई डेमोक्रेटिक शासित राज्यों ने अलग से मुकदमा दायर किया है, जबकि कुछ नर्सिंग एजेंसियों और श्रमिक संगठनों ने भी अदालत का रुख किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है।
जानकारों ने यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि इतनी अधिक फीस से स्कूलों, अस्पतालों और टेक कंपनियों में कुशल कर्मचारियों की भारी कमी हो सकती है, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक सेवाओं पर सीधा असर पड़ेगा।
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