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Bangladesh में फिर जली इंसानियत, हिंदू व्यापारी Khokon Chandra Das की तड़प कर मौत, अल्पसंख्यकों पर हमलों का सिलसिला जारी

बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय के खिलाफ जारी हिंसा के शिकार लोगों की संख्या में वृद्धि हो गयी है। हम आपको बता दें कि शरीयतपुर जिले में रहने वाले पचास वर्षीय हिन्दू व्यवसायी खोकोन चंद्र दास की तीन दिन तक मौत से जंग के बाद अस्पताल में मृत्यु हो गई। उल्लेखनीय है कि 31 दिसंबर की रात उन पर उग्र भीड़ ने हमला किया, बेरहमी से पीटा और फिर पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया था। जान बचाने के लिए दास ने तालाब में छलांग लगाई, लेकिन शरीर का बड़ा हिस्सा जल जाने और गंभीर चोटों के कारण उन्हें बचाया नहीं जा सका।
परिवार के अनुसार खोकोन दास का किसी से कोई विवाद नहीं था। वह एक साधारण व्यापारी थे और शांत जीवन जी रहे थे। इसके बावजूद उन्हें जिस निर्दयता से मारा गया, उसने पूरे क्षेत्र में दहशत फैला दी है। देखा जाये तो यह घटना कोई अकेली वारदात नहीं है। बीते कुछ हफ्तों में बांग्लादेश के अलग-अलग इलाकों से हिन्दू समुदाय के खिलाफ हिंसा, मारपीट, घर जलाने और हत्या की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

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स्थानीय प्रशासन ने जांच और गिरफ्तारी का आश्वासन दिया है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय में भय गहराता जा रहा है। कई परिवार अपने घर छोड़ने को मजबूर हैं। धार्मिक पहचान अब खतरे का कारण बनती जा रही है। खोकोन दास की मौत ने बांग्लादेश में कानून व्यवस्था और सामाजिक संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
देखा जाये तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं है। यह एक चेतावनी है। बांग्लादेश में हिन्दू समुदाय पर हो रहे हमले अब संयोग नहीं रह गए हैं। यह एक पैटर्न है, एक भयावह सिलसिला है जिसे नजरअंदाज करना आत्मघाती भूल होगी। जिस देश ने कभी धार्मिक सहअस्तित्व और सांस्कृतिक विविधता पर गर्व किया था, वहां आज अल्पसंख्यक खुलेआम निशाना बनाए जा रहे हैं। खोकोन दास को जिंदा जलाया जाना सिर्फ क्रूरता नहीं, यह सामाजिक पतन का चरम है। भीड़ का उन्माद जब इंसान को इंसान नहीं रहने देता, तब सभ्यता की सारी परतें उतर जाती हैं।
यह सवाल पूछना जरूरी है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। क्या यह सिर्फ कानून व्यवस्था की नाकामी है या इसके पीछे एक गहरी सामाजिक बीमारी पनप चुकी है। जब एक समुदाय को बार बार कमजोर समझ कर निशाना बनाया जाए, जब अपराधियों को यह भरोसा हो कि उन्हें सजा नहीं मिलेगी, तब हिंसा एक सामान्य प्रक्रिया बन जाती है।
इसका सामाजिक प्रभाव अत्यंत खतरनाक है। डर सिर्फ मारे गए व्यक्ति के परिवार तक सीमित नहीं रहता। डर पूरे समुदाय में फैलता है। बच्चे भय में पलते हैं, महिलाएं असुरक्षित महसूस करती हैं, बुजुर्गों का भरोसा टूट जाता है। जब नागरिक अपने ही देश में खुद को पराया समझने लगें, तब राष्ट्र की आत्मा घायल होती है। इसका आर्थिक असर भी कम विनाशकारी नहीं है। अल्पसंख्यक व्यापारी दुकानें बंद कर रहे हैं, निवेश रुक रहा है, स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है। डर के माहौल में न व्यापार फलता है, न समाज आगे बढ़ता है। देखा जाये तो यह हिंसा सिर्फ जान नहीं ले रही, यह भविष्य को भी जला रही है।
इसके सामरिक प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बांग्लादेश भारत की सीमा से सटा देश है। वहां अस्थिरता, सांप्रदायिक तनाव और भीड़ की राजनीति का सीधा असर पूरे क्षेत्र की सुरक्षा पर पड़ता है। जब किसी देश के भीतर नफरत का जहर फैलता है, तो वह सीमाओं में नहीं रुकता। यह कट्टरता, अविश्वास और अराजकता को जन्म देता है। देखा जाये तो दक्षिण एशिया पहले ही कई मोर्चों पर अस्थिरता झेल रहा है। ऐसे में बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा पूरे क्षेत्र के लिए चिंता का विषय है। यह सिर्फ मानवीय संकट नहीं, यह रणनीतिक खतरा भी है। कमजोर समाज बाहरी हस्तक्षेप और चरमपंथ के लिए आसान शिकार बन जाते हैं।
सबसे दुखद यह है कि हर घटना के बाद वही घिसे पिटे बयान आते हैं। जांच होगी, कार्रवाई होगी, दोषियों को नहीं बख्शा जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदलती। जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत नहीं होगी, जब तक अपराध को धार्मिक चश्मे से देखने वालों को संरक्षण मिलता रहेगा, तब तक हालात नहीं बदलेंगे। बांग्लादेश को यह समझना होगा कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा कोई एहसान नहीं, यह राज्य का कर्तव्य है। संविधान सिर्फ किताब में सजाने के लिए नहीं होता। कानून का राज तब माना जाएगा जब कमजोर भी खुद को सुरक्षित महसूस करे।
बहरहाल, बांग्लादेश के हालात को देखते हुए भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आंखें मूंदे नहीं बैठना चाहिए। यह मुद्दा सिर्फ एक देश का आंतरिक मामला कह कर टाला नहीं जा सकता। जब मानवता जल रही हो, तब चुप्पी भी अपराध बन जाती है। खोकोन दास की जली हुई देह हमसे सवाल पूछ रही है। अगर आज आवाज नहीं उठी, अगर आज ठोस कदम नहीं उठे, तो कल यह आग और भी फैल सकती है। यह समय है साफ और सख्त संदेश देने का। हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी यह संदेश देना होगा, अल्पसंख्यक दूसरे दर्जे के नागरिक नहीं हैं यह संदेश देना होगा।


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