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66 अमेरिकियों के साथ ईरान का खौफनाक काम, बदले की आग में जल रहे ट्रंप

दुनिया की राजनीति में कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो सिर्फ इतिहास ही नहीं बल्कि वर्तामन में भी बड़े टकराव की जड़ बन जाती है। एक ऐसी ही कहानी जिसमें सत्ता बदली, रिश्ते टूटे और भरोसे की जगह गरही दुश्मनी ने ले ली। कभी एक दूसरे के दोस्त देश कैसे एक दूसरे के सबसे बड़े विरोधी बन गए। उस दौर की ऐसी कहानी जहां से शुरू हुआ टकराव जिसका असर आज भी खत्म नहीं हुआ है। 4 नवंबर 1979 अमेरिका के विदेश मंत्रालय में टेलीफोन की घंटी बजती है। फोन ईरान के अमेरिकी दूतावास से था और कॉल पर ऑफिसर एलिजाबेथ स्विफ्ट थी। एक ही सांस में उन्होंने कहना शुरू किया कि ईरानियों ने हमला कर दिया है। भीड़ दीवार फांद कर अंदर घुस रही है। दूतावास पर कभी भी कब्जा हो सकता है। स्विफ्ट अभी फोन पर ही थी, तभी ईरानियों ने दूतावास की पहली मंजिल में आग लगा दी। सभी कर्मचारी बाहर की तरफ भागे। दूतावास के स्टाफ को मेन गेट खोलना पड़ा। फोन कटने से पहले स्विफ्ट के आखिरी शब्द थे- वी आर गोइंग।

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डाउन दूतावास तबाह होने वाला था। अगले कुछ मिनटों में अमेरिकी डिप्लोमेट्स और कर्मचारियों को बंधक बना लिया गया। उनकी आँख पर पट्टी बांध दी गई। ना उन्हें कुछ देखने की इजाजत थी ना ही कुछ बोलने की। यह खबर जैसे ही अमेरिका तक पहुंची पूरी सरकारी मशीनरी सक्रिय हो गई। राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर पल-पल की खबर ले रहे थे। कुछ देर बाद अचानक उनकी नजर टीवी स्क्रीन पर पड़ी जो नजारा दिखा उसने दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी। तेहरान में अमेरिकी नागरिकों, राजदूतों और कर्मचारियों को परेड कर ले जाया जा रहा था। पीछे भीड़ उनकी मौत के नारे लगा रही थी। पूरी दुनिया यह नजारा देख रही थी, सुपर पावर अमेरिका को ईरान ने घुटनों पर ला दिया था। 

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अमेरिका को कैसे ईरान ने सिखाया इतिहास का सबसे बड़ा सबक

1 अप्रैल 1979 को ईरान को एक इस्लामिक रिपब्लिक घोषित कर दिया गया। लेकिन खुमैनी का बदला अभी पूरा नहीं हुआ था वह शाह पहलवी को सबक सिखाना चाहते थे साथ ही अमेरिका को भी अब अमेरिका को क्यों क्योंकि शाह कैंसर का इलाज कराने के बहाने ईरान से भागकर अमेरिका चले गए थे उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति थे जिमी कार्टर ईरान ने अमेरिका से शाह को लौटाने के लिए कहा लेकिन अमेरिका ने ऐसा करने से मना कर दिया क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच डिप्लोमेटिक रिलेशंस खत्म हो चुके थे पर खुमैनी को बदला लेना ही था। 4 नवंबर 1979 को वह दिन भी आ गया सुबह-सुबह एक भीड़ अमेरिकी दूतावास की तरफ बढ़ने लगी। यह प्रदर्शनकारियों की भीड़ थी। इस भीड़ को खुमैनी का मौन समर्थन प्राप्त था। देखते ही देखते सभी डिप्लोमेट्स और कर्मचारियों को बंदी बना लिया गया जो संख्या में 66 थे। 

 

Source: Prabha Sakshi via DNI News (Prayagraj)

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