उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPCS) 2024 के नतीजों ने कानपुर का मान बढ़ा दिया है। शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों के युवाओं ने अपनी मेधा से यह साबित कर दिया है कि अगर लक्ष्य तय हो, तो सफलता कदम चूमती है। घोषित परिणामों में कोई अपनी चौथी कोशिश के संघर्ष के बाद अधिकारी बना है, तो किसी ने अपने पहले ही इंटरव्यू में प्रदेश भर में पहली रैंक हासिल कर ली। सफलता की इन कहानियों में खास बात यह है कि चयनित हुए अभ्यर्थी पहले से ही कहीं न कहीं अपनी सेवाएं दे रहे थे या उच्च शिक्षण संस्थानों से जुड़े थे। पहले ही मेंस में सृष्टि ने किया कमाल, बनीं प्रदेश की नंबर वन सब-रजिस्ट्रार
कानपुर की बेटी सृष्टि गुप्ता ने अपनी सफलता से सबको चौंका दिया है। सृष्टि का यह दूसरा प्रयास था, लेकिन पहली बार उन्हें मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू देने का मौका मिला। पहले ही सफल प्रयास में उन्होंने ‘सब-रजिस्ट्रार’ के पद पर उत्तर प्रदेश में पहली रैंक हासिल की है। सृष्टि के पिता विजय राम गुप्ता का एलपीजी डिस्ट्रब्यूशन का कारोबार है। अपनी इस कामयाबी का श्रेय वे अपने माता-पिता के धैर्य और पुराने प्रश्नपत्रों के सटीक विश्लेषण को देती हैं। सृष्टि ने बताया कि तैयारी के दौरान उन्होंने खुद को एक कमरे तक सीमित कर लिया था और सोशल मीडिया से पूरी तरह नाता तोड़ लिया था, ताकि लक्ष्य से ध्यान न भटके। IIT की पढ़ाई के बाद अब कमर्शियल टैक्स ऑफिसर की जिम्मेदारी
महानगर की प्रतिभावान बेटी ने अपनी सफलता का परचम लहराया है। आईआईटी बीएचयू से बीटेक और आईआईटी कानपुर से एमटेक करने वाली इस मेधावी छात्रा का चयन ‘कमर्शियल टैक्स ऑफिसर’ के पद पर हुआ है। इनके पिता ओम प्रकाश यादव वर्तमान में फिरोजाबाद में बीडीओ (BDO) के पद पर कार्यरत हैं। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने सिविल सेवा में आने का फैसला किया। जब रिजल्ट घोषित हुआ, तब वे खुद पीसीएस 2025 की मुख्य परीक्षा दे रही थीं। परीक्षा केंद्र पर ही उन्हें घर वालों से इस बड़ी खुशखबरी की जानकारी मिली। उनका मानना है कि सिलेबस को समय पर पूरा करना और उत्तर लेखन में निरंतरता ही सफलता की असली चाबी है। एक ही सीट पर अविनाश का कब्जा, लेखपाल से अब संभालेंगे जेल का प्रशासन कानपुर देहात के जलियापुर गांव के रहने वाले अविनाश मिश्रा की कहानी संघर्ष और धैर्य की मिसाल है। 27 साल के अविनाश फिलहाल अपनी मूल तहसील डेरापुर में लेखपाल के पद पर तैनात हैं, लेकिन अब वे उत्तर प्रदेश में ‘जेल अधीक्षक’ की जिम्मेदारी संभालेंगे। अविनाश ने बताया कि 2020 से वे लगातार तैयारी कर रहे थे और तीन बार मुख्य परीक्षा (मेंस) में फेल होने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इस चौथे प्रयास में उन्हें वह सफलता मिली जिसकी उन्हें तलाश थी। दिलचस्प बात यह है कि पूरे प्रदेश में जेल अधीक्षक का केवल एक ही पद था और अविनाश ने उस इकलौती सीट पर अपना चयन सुनिश्चित कर जिले का नाम रोशन किया है। उनके पिता पंकज मिश्रा शिक्षक हैं और घर में शुरू से ही पढ़ाई का माहौल रहा है।

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