जौनपुर में बुधवार को संयुक्त पेंशनर्स कल्याण समिति के तत्वावधान में सैकड़ों पेंशनरों ने विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने मुख्यमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन सिटी मजिस्ट्रेट को सौंपा। इस दौरान पेंशनरों ने एक नए वित्त अधिनियम के प्रावधानों पर चिंता व्यक्त की, जबकि सेवानिवृत्त शिक्षकों ने निःशुल्क कैशलेस चिकित्सा सुविधा में शामिल किए जाने की मांग की। पेंशनरों ने बताया कि केंद्र सरकार का एक अधिनियम पेंशनभोगियों का वर्गीकरण करने और उनके बीच अंतर बनाए रखने का अधिकार देता है। यह अधिनियम बिना किसी पूर्व सूचना के वित्त विधेयक के हिस्से के रूप में लोकसभा में प्रस्तुत किया गया और उसी दिन अनुमोदित भी हो गया। समिति का कहना है कि यदि यह अधिनियम लागू होता है, तो पेंशनभोगियों की सेवानिवृत्ति की तिथि को पेंशन पात्रता का आधार बनाया जाएगा। इससे किसी भी केंद्रीय या अन्य वेतन आयोग की सिफारिशों के लाभ से वे पेंशनभोगी वंचित हो जाएंगे, जो आयोग के कार्यकाल से पहले सेवानिवृत्त हुए हैं। यह एक बड़ा भेदभाव पैदा करेगा। फेडरेशन ने आशंका व्यक्त की है कि इससे वर्तमान पेंशनभोगियों को गंभीर आर्थिक हानि होगी, खासकर मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में, क्योंकि वे पेंशन वृद्धि के लाभ से वंचित रह जाएंगे।
इसी बीच, उत्तर प्रदेश के सेवानिवृत्त प्राथमिक शिक्षक निःशुल्क कैशलेस चिकित्सा सुविधा से वंचित हैं। वे कई वर्षों से राज्य कर्मचारियों की तरह कैशलेस चिकित्सा सुविधा की मांग कर रहे हैं। उन्हें पहले बताया गया था कि यह सुविधा केवल सेवारत राज्य कर्मचारियों और सेवानिवृत्त होने पर भी उन्हीं को मिलती है, जिससे वे बाहर थे। 5 सितंबर, 2025 को शिक्षक दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री ने बेसिक शिक्षा परिषद के शिक्षकों, शिक्षा मित्रों, शिक्षणेत्तर कर्मचारियों और अशासकीय शिक्षकों को निःशुल्क चिकित्सा सुविधा प्रदान करने की घोषणा की थी। इस घोषणा से सेवानिवृत्त शिक्षकों में भी यह उम्मीद जगी थी कि उन्हें भी यह सुविधा मिलेगी। हालांकि, मुख्यमंत्री की घोषणा के बावजूद, जारी शासनादेश में सेवानिवृत्त प्राथमिक शिक्षकों को शामिल नहीं किया गया है। अब उन्होंने मुख्यमंत्री से इस सुविधा में उन्हें भी शामिल करने की मांग की है।

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