बलरामपुर के देवीपाटन शक्तिपीठ में चैत्र नवरात्र के अवसर पर सिद्ध पीर बाबा रतननाथ की सदियों पुरानी शोभायात्रा पंचमी तिथि पर पहुँची। यह यात्रा भारत और नेपाल की सांस्कृतिक एकता तथा आस्था का प्रतीक है, जिसकी शुरुआत विक्रम संवत 809 में हुई थी। यह ऐतिहासिक शोभायात्रा नेपाल के दांग जिले से प्रारंभ होती है। नौ दिनों की कठिन पदयात्रा के बाद यह भारत पहुंचती है, जिसमें अमृत कलश और पात्र देवता भी शामिल होते हैं। यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि भारत-नेपाल के बीच आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंधों की जीवंत मिसाल है। शोभायात्रा के भारतीय सीमा में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं ने इसका भव्य स्वागत किया। पूरे मार्ग में हाथी-घोड़े शामिल रहे, वहीं नेपाली कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए। डीजे की धुन पर लोक नृत्य करते श्रद्धालु यात्रा के साथ चलते रहे, जिससे वातावरण भक्तिमय बना रहा। मंदिर परिसर में शोभायात्रा की अगुवानी के लिए महंत मिथिलेश नाथ योगी सहित बड़ी संख्या में साधु-संत उपस्थित थे। श्रद्धालुओं की भीड़ और जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। मान्यताओं के अनुसार, बाबा रतननाथ आठ सिद्धियों के स्वामी और गुरु गोरक्षनाथ के शिष्य थे। उन्होंने देवीपाटन शक्तिपीठ के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक प्रचलित कथा के अनुसार, विश्व भ्रमण के दौरान वे मक्का-मदीना पहुँचे थे, जहाँ मोहम्मद साहब ने उनके ज्ञान से प्रभावित होकर उन्हें ‘पीर’ की उपाधि दी थी। तभी से वे ‘सिद्ध पीर बाबा रतननाथ’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बाबा रतननाथ माता पाटेश्वरी के अनन्य भक्त थे और प्रतिदिन दांग से देवीपाटन आकर पूजा करते थे। कहा जाता है कि गुरु गोरक्षनाथ द्वारा दिए गए अमृत पात्र के प्रभाव से वे लगभग 700 वर्षों तक जीवित रहे। यही अमृत कलश आज भी हर वर्ष चैत्र नवरात्र की पंचमी को उनके प्रतिनिधियों द्वारा देवीपाटन लाया जाता है। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित देवीपाटन शक्तिपीठ धार्मिक आस्था के केंद्र के साथ-साथ दोनों देशों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द, सांस्कृतिक एकता और ऐतिहासिक संबंधों की गहराई को भी दर्शाता है।

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