संभल से समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने इजरायली संसद द्वारा हाल ही में पारित सज़ा-ए-मौत के फैसले की कड़ी निंदा की है। बुधवार को उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर पोस्ट करते हुए इस फैसले को फलस्तीनियों के खिलाफ भेदभाव और मानवता पर हमला बताया। सांसद बर्क ने अपने पोस्ट में लिखा कि यह फैसला केवल एक नया कानून नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम का प्रमाण है जो अब बेनकाब हो चुका है। उन्होंने तर्क दिया कि जब कानून का उद्देश्य न्याय देना नहीं, बल्कि एक विशेष पहचान, यानी फलस्तीनियों को निशाना बनाना हो, तो ‘इंसाफ की भावना मर चुकी होती है’।
उन्होंने इस कानून को पूरी तरह भेदभावपूर्ण बताया। बर्क के अनुसार, “स्टेट ऑफ इजरायल को नकारने की मंशा” जैसे अस्पष्ट आरोपों के आधार पर अब मौत की सज़ा दी जाएगी। उन्होंने कहा कि जहाँ दलीलें समाप्त हो जाती हैं, वहाँ अक्सर ताकतवर मौत का डर पैदा करने लगता है। सांसद बर्क ने इस स्थिति को “नस्लकुशी” करार दिया, जो दुनिया की आँखों के सामने हो रही है। उन्होंने कहा कि इसे किसी और नाम से पुकारना सच्चाई से मुँह मोड़ना होगा। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया पर भी सवाल उठाए। बर्क ने कहा कि जब दुनिया की प्रतिक्रिया उदासीन होती है और शक्तिशाली देशों की जवाबदेही तय नहीं होती, तो धीरे-धीरे अन्याय को ही सामान्य मान लिया जाता है। सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने इस बात पर जोर दिया कि फलस्तीन की गलियों में जो कुछ हो रहा है, वह केवल फलस्तीनियों के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के अस्तित्व पर हमला है। उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाली पीढ़ियाँ सवाल करेंगी कि जब न्याय का जनाज़ा निकल रहा था और मासूमों का खून बह रहा था, तब लोग कहाँ थे। उन्होंने लोगों से अपनी आवाज़ उठाने का आग्रह करते हुए कहा कि अत्याचार के खिलाफ खामोश रहना भी अत्याचारी का साथ देना ही है।

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