पंजाब में जब भाषा आंदोलन शुरू हुआ तो दरारें पैदा होने लगी. इसी समय सरदार चिरंजीव सिंह जी ने एम एस गोलवलकर से संपर्क किया था. तब गोलवलकर पंजाब आए और कहा कि पंजाब में रहने वाले सभी सिखों, हिंदुओं और मुसलमानों की मातृभाषा पंजाबी है और उन्हें अपनी मातृभाषा पंजाबी के रूप में दर्ज करानी चाहिए. इस कदम ने तत्काल मरहम का काम किया. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है वही कहानी.
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