छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) के रानी लक्ष्मीबाई सभागार में चल रही श्री हनुमान कथा के पांचवें दिन प्रसिद्ध संत विजय कौशल जी महाराज ने लक्ष्मण मूर्छा और हनुमान जी के पराक्रम का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि कैसे भक्ति और संकल्प के बल पर हनुमान जी ने असंभव कार्यों को संभव कर दिखाया। इस दौरान उन्होंने प्रभु राम के मानवीय स्वरूप और भ्रातृ प्रेम की ऐसी व्याख्या की कि उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो गए। महाराज जी ने बताया कि, जब मेघनाद के शक्ति बाण से लक्ष्मण मूर्छित हुए, तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम एक साधारण मनुष्य की तरह विलाप करने लगे। उन्होंने लक्ष्मण को ‘सहोदर’ कहकर संबोधित किया और कहा कि उनके बिना वे वैसे ही असहाय हैं जैसे पंखों के बिना पक्षी। इसी संकट के समय हनुमान जी ने अपनी अटूट भक्ति का परिचय देते हुए कहा- ‘मैं हूं ना’। वे न केवल लंका से राजवैद्य सुषेण को लेकर आए, बल्कि उनके कहने पर पूरा रत्नागिरी पर्वत ही उठाकर ले आए। जब सीता मैया के आशीर्वाद से जीती हारी हुई बाजी कथा के दौरान महाराज जी ने एक रोचक प्रसंग सुनाया कि रावण के पास 6000 सैनिकों की ऐसी ‘अमर सेना’ थी, जिसे कोई मार नहीं सकता था। जब रावण ने उन्हें युद्ध में उतारा, तो हनुमान जी ने माता सीता से मिले ‘अजर-अमर’ होने के आशीर्वाद का स्मरण किया। उन्होंने अकेले ही उस सेना का सामना किया और सभी सैनिकों को अपनी पूंछ में लपेटकर अंतरिक्ष में भेज दिया, जहां वे उपग्रह की तरह चक्कर लगाने लगे और वापस नहीं आ सके। भगवान खोजे नहीं, पुकारे जाते हैं विजय कौशल जी ने स्पष्ट किया कि भगवान का अपना कोई रूप या नाम नहीं होता, यह सब उन्हें भक्त प्रदान करता है। उन्होंने नरसी भक्त की कथा के माध्यम से समझाया कि ईश्वर को खोजने की जरूरत नहीं है, बस उन्हें सच्चे मन से पुकारने की आवश्यकता है।

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