लखनऊ में जनवादी लेखक संघ द्वारा कैफी आज़मी एकेडमी में प्रख्यात लेखक सुभाष राय की नई पुस्तक ‘आत्मसम्भवा आंडाल’ का विमोचन किया गया। इस अवसर पर पुस्तक पर एक परिचर्चा भी आयोजित की गई, जिसमें शहर के साहित्यकार, बुद्धिजीवी और पाठक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का आरंभ सुभाष राय के साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालते हुए हुआ। मंच पर जीवन सिंह, देवेंद्र, नलिन रंजन सिंह, प्रीति चौधरी और ज्ञान प्रकाश चौबे ने संयुक्त रूप से पुस्तक का विमोचन किया। कार्यक्रम का संचालन ज्ञान प्रकाश चौबे ने किया। रचनाओं में स्त्री और पुरुष गुणों का अद्भुत संतुलन अपने आत्मकथ्य में लेखक सुभाष राय ने बताया कि आंडाल पर शोध करते समय वे मानसिक द्वंद्व से गुजरे। उनके अनुसार, आंडाल की दो छवियां सामने आती हैं: एक वह जिसे समाज ने देवी के रूप में गढ़ा, और दूसरी वह जो उनके मन में एक अनन्य भक्तिन के रूप में उभरी।परिचर्चा के दौरान कहानीकार प्रीति सिंह ने टिप्पणी की कि आंडाल की रचनाओं में स्त्री और पुरुष गुणों का अद्भुत संतुलन है। उन्होंने इसे आत्मानुभूति की एक अनूठी यात्रा बताया। आंडाल की लेखन शैली स्वाभाविक वरिष्ठ आलोचक नलिन रंजन सिंह ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि आंडाल के बारे में उन्हें वास्तविक और गहरी जानकारी इसी कृति से प्राप्त हुई। उन्होंने आंडाल की लेखन शैली को स्वाभाविक और प्रवाहमयी बताया।कथाकार देवेंद्र ने पुस्तक के एक महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आंडाल द्वारा स्त्री देह के संदर्भ में किया गया वर्णन उस समय की सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध एक प्रकार का विद्रोह है। जीवन सिंह ने आंडाल की तुलना भक्त कवयित्री मीराबाई से की। उन्होंने जोर दिया कि आंडाल के समय और संदर्भ को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। कार्यक्रम के अंत में सुभाष राय ने अपनी लेखन प्रक्रिया और पुस्तक के उद्देश्य पर संक्षिप्त चर्चा की।

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