लखनऊ में नव संवत्सर के अवसर पर साहित्य संगोष्ठी और काव्य समारोह का आयोजन किया गया। यह आयोजन अखिल भारतीय साहित्य परिषद, महानगर लखनऊ की ओर से किया गया। यह कार्यक्रम सृजन विहार स्थित राष्ट्रीय अध्यक्ष सुशील कुमार के आवास पर हुईं । कार्यक्रम का शुभारंभ वाणी वंदना के साथ किया गया , जिसे निर्भय नारायण ने ‘मातु वर दो अब दिन दुखी कोई ना रहे’ मधुर स्वरों में प्रस्तुत किया। इसके बाद दीप प्रज्वलन किया गया और परिषद गीत ‘गीत भारती की लोक मंगल साधना साकार हो’ गाया गया। लोक परंपरा की झलक दिखाई दी काव्य पाठ के दौरान राजीव वर्मा ‘वत्सल’ ने अपनी कविताओं के साथ बांसुरी वादन से श्रोताओं को भाव विभोर किया। डॉ. ममता ‘पंकज’ ने षष्ठी पर्व पर आधारित छठ गीत प्रस्तुत कर लोक परंपरा की झलक दिखाई।अवध प्रांत अध्यक्ष विजय त्रिपाठी ने साहित्य और संस्कृति के पुनर्निर्माण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नव निर्माण से अधिक महत्वपूर्ण हमारी पुरानी साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपराओं का पुनर्निर्माण है। आचार्य अभिनव की कृतियों पर चर्चा करने की सलाह राष्ट्रीय महामंत्री पवनपुत्र बादल ने साहित्यकारों को आचार्य अभिनव सहित प्रतिष्ठित लेखकों को पढ़ने और उनकी कृतियों पर चर्चा करने की सलाह दी। महानगर अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त ने पिछले वर्ष के 14 साहित्यिक आयोजनों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि परिषद ने काव्य, चर्चा, सांस्कृतिक अनुष्ठान और साहित्यिक यात्राओं के माध्यम से साहित्य चिंतन को बढ़ावा दिया है। रामनवमी पर आधारित काव्य प्रस्तुत किए कार्यकारी अध्यक्ष विनोद कुमार ‘भावुक’ ने साहित्य की समृद्धि के लिए इतिहास के अध्ययन को आवश्यक बताया।संगोष्ठी में अरविंद रस्तोगी, मनमोहन बाराकोटी ‘तमाचा लखनवी’, मृगांक श्रीवास्तव, ज्योति किरण रतन सहित कई रचनाकारों ने नव संवत्सर, नवरात्रि और रामनवमी पर आधारित काव्य प्रस्तुत किए। इसी अवसर पर परिषद की पत्रिका ‘साहित्य परिक्रमा’ का भी लोकार्पण किया गया।

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