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लखनऊ में अब ‘टॉकिंग सर्जरी’ का कल्चर:एनेस्थीसिया डोज में आई एक तिहाई की कमी, SGPGI के एक्सपर्ट्स ने गिनाईं खूबियां


                 लखनऊ में अब 'टॉकिंग सर्जरी' का कल्चर:एनेस्थीसिया डोज में आई एक तिहाई की कमी, SGPGI के एक्सपर्ट्स ने गिनाईं खूबियां

लखनऊ में अब ‘टॉकिंग सर्जरी’ का कल्चर:एनेस्थीसिया डोज में आई एक तिहाई की कमी, SGPGI के एक्सपर्ट्स ने गिनाईं खूबियां

‘सेग्मेंटल स्पाइनल एनेस्थीसिया का सबसे बड़ा फायदा ये हैं कि इसके जरिए सिर्फ शरीर के उस हिस्से को सुन्न किया जाता है जहां पर सर्जरी होनी है। शरीर के शेष हिस्से इस डोज से प्रभावित नहीं होते हैं। इसका एक फायदा यह भी है कि शरीर में एनेस्थीसिया की डोज कम जाती है, जिससे पेशेंट के हार्ट बीट और ब्लड प्रेशर का लेवल मेंटेन रहता है। डोज कम होने से कॉस्टली ड्रग की खपत कम होती है। कॉस्ट बेहद कम रहता है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता हैं कि पेशेंट की सेफ्टी के साथ रिकवरी जल्दी होती है और कॉस्ट भी कम लगती है।’ ये कहना हैं SGPGI के एनेस्थीसिया विभाग के फैकल्टी प्रो. संदीप खूबा का। लखनऊ में एनेस्थीसिया पर चल रही इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के दौरान दैनिक भास्कर से खास बातचीत में उन्होंने इस विधा की खूबियों के बारें में जानकारी दी। टॉकिंग सर्जरी के कांसेप्ट को भी समझाया। घातक है एनेस्थीसिया की हाई डोज हाई रिस्क पेशेंट के लिए ये बेहद कारगर है। खास तौर पर वह पेशेंट जिनके लिए एनेस्थीसिया की डोज साइड इफेक्ट के लिए लिहाज से घातक साबित हो सकती है। उनके लिए इस तकनीक का ये फायदा है कि इसमें बेहद कम या नाम मात्र एनेस्थीसिया की डोज ही पेशेंट को दी जाती है। पहले ऑर्थोपेडिक सर्जरी या फिर एब्डोमिनल सर्जरी के दौरान करीब 3 से 4 ml एनेस्थीसिया की डोज पेशेंट को दी जाती थी। अब ये महज 1ml में काम हो जाता हैं। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि पहले की अपेक्षा करीब एक तिहाई डोज से कई गुना बेहतर परिणाम मिल रहे हैं। फेफड़ों के रोगियों के लिए बेहद विभाग के प्रमुख डॉ. संजय धिराज कहते हैं कि जनरल एनेस्थीसिया देते समय कई बार पेशेंट को पोस्ट ऑपरेटिव वेंटिलेशन देना पड़ता हैं। ये प्रोटोकॉल लंबे समय से फॉलो होता आया है। एक और अहम बात इस विधा से प्री-ऑपरेटिव एनेस्थीसिया चेकअप बहुत जल्दी होता है। अब ‘टॉकिंग सर्जरी’ भी संभव डॉ. संजय धिराज ने बताया कि इस विधा से अब तक 100 से ज्यादा बेहद क्रिटिकल सर्जरी की जा चुकी है। इनमें टॉकिंग सर्जरी भी शामिल हैं। ये वे सर्जरी होती हैं जिनमें सर्जरी के दौरान मरीज डॉक्टर की बातों को रेस्पांड भी करता है। ज्यादातर समय मरीज सर्जरी के दौरान होश में भी रहता है। बस जिस हिस्से में सर्जरी होनी हैं, सिर्फ उसे ही सुन्न किया जाता है। जैसे स्पाइनल सर्जरी के दौरान सेग्मेंटल एनेस्थीसिया देकर मरीज के बाकी हिस्से सामान्य रूप से काम करते हैं। ऐसे में सर्जरी के दौरान शरीर का कही कोई अन्य भाग प्रभावित तो नहीं हो रहा है, इसकी रियल टाइम जानकारी मिल जाती है। नेचर ऑफ ड्रग में आया यह फर्क डॉ. धिराज कहते हैं कि पहले जो हमें ड्रग दी जाती थी वह सभी हैवी ड्रग होते थे। इसका असर यह होता था कि एनेस्थीसिया की डोज देने के बाद ये शरीर के नीचे के हिस्से में चली जाती थी, जिससे मरीज के पैर सूज जाते थे। कई बार पैरों को भी सुन्न कर देते थे। अब जो ड्रग यूज हो रहे हैं वो ‘आइसोबैरिक’ नेचर के हैं। इन्हें जब भी यूज किया जाएगा, तो सिर्फ उसी अंग तक प्रभाव सीमित रहता है।


Source: Dainik Bhaskar via DNI News

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