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यूपी में 4995 धरोहरें बदहाल, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब:हाईकोर्ट ने केंद्र और यूपी सरकार को नोटिस जारी कर रिपोर्ट मांगी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में हजारों ऐतिहासिक धरोहरों की खराब स्थिति पर गंभीर चिंता जताते हुए केंद्र और राज्य सरकार समेत कई एजेंसियों को नोटिस जारी किया है।
द्वअदालत में दायर एक जनहित याचिका में दावा किया गया है कि प्रदेश की 4995 प्राचीन इमारतें और स्मारक “खस्ताहाल हैं और पूरी तरह खत्म होने के कगार पर हैं। चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, संस्कृति, पर्यटन और आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालयों तथा राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण से 8 सप्ताह में जवाब मांगा। 5416 ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल याचिका में कहा गया कि प्रदेश में कुल 5416 ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल हैं, लेकिन इनमें से केवल 421 ही किसी न किसी सरकारी संरक्षण में हैं। बाकी 4995 स्मारक पूरी तरह असुरक्षित हैं और उन पर अतिक्रमण, कब्जा या अन्य उपयोग हो रहा है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि राज्य पुरातत्व विभाग ने 2011 के बाद से ऐसे असुरक्षित स्मारकों की पहचान और सूची तैयार करने का कोई ठोस प्रयास नहीं किया। याचिका में कहा गया कि कई प्राचीन स्मारकों को तोड़कर नए निर्माण कर दिए गए हैं और कई जगहों पर उनका कोई निशान तक नहीं बचा है। संरक्षण के अभाव में हालत खराब याचिका में कहा गया है कि “संरक्षण के अभाव में कई धरोहरें पूरी तरह मिटा दी गई हैं।” झांसी, वृंदावन, आगरा, लखनऊ और हस्तिनापुर जैसे ऐतिहासिक क्षेत्रों का विशेष उल्लेख करते हुए कहा गया कि यहां भी स्थिति बेहद खराब है। वृंदावन क्षेत्र को लेकर याचिका में दावा किया गया कि यहां 5000 से अधिक प्राचीन स्थल हैं, जिनमें यमुना नदी के 48 घाट शामिल हैं, लेकिन इन्हें न तो सूचीबद्ध किया गया और न ही संरक्षित किया गया। याचिका में यह भी कहा गया कि जो स्मारक संरक्षित बताए जाते हैं, उनकी हालत भी संतोषजनक नहीं है। झांसी का रानी लक्ष्मीबाई किला, लखनऊ का इमामबाड़ा और वृंदावन का राधा बल्लभ मंदिर जैसे स्थल भी क्षति और उपेक्षा का शिकार हैं। याचिका में अदालत से मांग की गई कि सभी धरोहर स्थलों की पहचान कर उनका दस्तावेजीकरण किया जाए और उन्हें संरक्षण दिया जाए। साथ ही प्रत्येक संरक्षित स्मारक के लिए हेरिटेज उपनियम और विस्तृत योजना तैयार करने के निर्देश दिए जाएं। इसके अलावा पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति, सुरक्षा व्यवस्था, चेतावनी संकेत लगाने और एक “हेरिटेज संरक्षण एवं विकास बोर्ड” बनाने की भी मांग की गई। जनहित याचिका गाजियाबाद के अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ ने दायर किया है।

Source: Dainik Bhaskar via DNI News (Prayagraj)

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