राजधानी लखनऊ स्थित डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय में चल रही शिक्षक भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों की अनदेखी करते हुए चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है। शिकायतकर्ताओं ने इस मामले की शिकायत राज्यपाल और कुलाधिपति से करते हुए भर्ती प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने और निष्पक्ष जांच की मांग की है।
चयन समिति के गठन पर उठे सवाल
शिकायतकर्ताओं का सबसे बड़ा आरोप चयन समिति के गठन को लेकर है। उनका कहना है कि UGC के 2018 के नियमों के अनुसार जिस संकाय में भर्ती हो रही है, उस संकायाध्यक्ष (डीन) को चयन समिति में शामिल करना अनिवार्य है। लेकिन यहां पर कई विभागों में डीन को शामिल नहीं किया गया। इससे चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अभ्यर्थियों का कहना है कि यह नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है और इससे पक्षपात की आशंका बढ़ जाती है।
लिखित परीक्षा में पारदर्शिता पर संदेह
विश्वविद्यालय द्वारा असिस्टेंट प्रोफेसर पदों के लिए आयोजित लिखित परीक्षा भी विवादों में है। आरोप है कि परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों को न तो प्रश्न पत्र दिया गया और न ही ओएमआर शीट की कॉपी उपलब्ध कराई गई। सामान्यतः अभ्यर्थियों को अपनी उत्तर पुस्तिका या उसकी कॉपी मिलती है, जिससे वे अपने उत्तरों का मिलान कर सकें। लेकिन यहां ऐसा नहीं किया गया। इतना ही नहीं, विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर आंसर की भी जारी नहीं की गई, जिससे अभ्यर्थी अपने प्रदर्शन का आकलन नहीं कर सके।
आपत्तियों का निस्तारण किए बिना जारी की गई सूची
शिकायतकर्ताओं के मुताबिक विश्वविद्यालय ने परीक्षा के बाद केवल तीन दिन का समय आपत्तियां दर्ज कराने के लिए दिया। लेकिन सबसे बड़ा आरोप यह है कि इन आपत्तियों का निस्तारण किए बिना ही साक्षात्कार के लिए चयनित अभ्यर्थियों की सूची जारी कर दी गई। इससे यह संदेह और गहरा हो गया कि पूरी प्रक्रिया पहले से तय दिशा में आगे बढ़ाई जा रही है।
इंटरव्यू के लिए कम समय देने पर भी सवाल
UGC गाइडलाइन के अनुसार अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए कम से कम 15 दिन का समय दिया जाना चाहिए, ताकि वे तैयारी कर सकें। लेकिन इस भर्ती प्रक्रिया में अभ्यर्थियों को महज 8 से 10 दिन का समय ही दिया गया। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह नियमों का उल्लंघन है और इससे दूरदराज के अभ्यर्थियों को नुकसान हुआ है।
70 से ज्यादा पदों पर चल रही है भर्ती प्रक्रिया
विश्वविद्यालय में इस समय 70 से अधिक पदों पर भर्ती प्रक्रिया चल रही है, जिनमें समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, अंग्रेजी, इतिहास, माइक्रोबायोलॉजी और सोशल वर्क जैसे विषय शामिल हैं। इतनी बड़ी भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर उठ रहे सवाल न सिर्फ अभ्यर्थियों बल्कि शैक्षणिक जगत में भी चर्चा का विषय बन गए हैं।
‘चहेते अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने’ का आरोप
शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि पूरी प्रक्रिया इस तरह से संचालित की जा रही है, जिससे कुछ चयनित अभ्यर्थियों को फायदा मिल सके। उनका कहना है कि जब न तो परीक्षा की आंसर शीट दी जा रही है, न आंसर की जारी हो रही है और न ही आपत्तियों का निस्तारण किया जा रहा है, तो प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भरोसा करना मुश्किल है।
राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग
इस पूरे मामले में शिकायतकर्ताओं ने राज्यपाल (कुलाधिपति) से हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि भर्ती प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रोका जाए और पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही यह भी मांग की गई है कि यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी
इन गंभीर आरोपों के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में अभ्यर्थियों की चिंता और बढ़ गई है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि शासन और कुलाधिपति इस मामले में क्या कदम उठाते हैं।

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