कॉमर्शियल गैस सिलिंडरों की भारी किल्लत के कारण शहर में हालात बिगड़ गए हैं। स्थिति यह है कि मशहूर हरिया जी लस्सी वालों को भी समोसे बनाना बंद करना पड़ा है। शास्त्रीनगर, बुढ़ाना गेट और कंकरखेड़ा जैसे प्रमुख इलाकों में समोसा, कचौरी और टिक्की की कई दुकानें बंद हो चुकी हैं। दुकानदारों का कहना है कि गैस सिलिंडर उपलब्ध न होने से कारोबार चलाना मुश्किल हो गया है। शास्त्रीनगर स्थित हरिया जी लस्सी वाले के संचालक सुनील साहू ने बताया कि सिलिंडर नहीं मिलने के कारण फिलहाल समोसे बनाना बंद कर दिया गया है। साकेत क्षेत्र में स्थित कैलाश डेरी एंड स्वीट्स के संचालक राजा अग्रवाल ने बताया कि शहर में कॉमर्शियल गैस सिलेंडरों की भारी किल्लत का सीधा असर उनके कारोबार पर पड़ा है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि उन्हें अपने स्नैक्स काउंटर—समोसे, ब्रेड पकोड़े, कचौरी, सब्जी, जलेबी समेत मिठाई बनाना पूरी तरह बंद करना पड़ा है। उन्होंने बताया कि गैस सिलेंडर, जो पहले करीब 1800 रुपए में मिलता था, अब 4000 रुपए तक खरीदना पड़ रहा है। इस वजह से लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है। मजबूरी में उन्होंने अपने मुख्य उत्पाद पनीर, दूध और दही की कीमतों में भी इजाफा किया है। पनीर के दाम में 40-50 रुपए प्रति किलो, दही में 30-40 रुपए प्रति किलो और अन्य उत्पादों में भी करीब 100 रुपए प्रति किलो तक बढ़ोतरी करनी पड़ी है। उन्होंने बताया कि गैस एजेंसियों और सप्लायर्स से बात करने पर भी कोई समाधान नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि खुद सप्लायर्स को कंपनी से पर्याप्त सप्लाई नहीं मिल रही है। उन्होंने बताया कि पिछले करीब 15 दिनों से स्थिति लगातार खराब बनी हुई है और अगर जल्द समाधान नहीं हुआ तो कारोबार पर और गंभीर असर पड़ सकता है। वहीं सेंट्रल मार्केट के कैलाश स्वीट्स के संचालक जितेंद्र अग्रवाल ने कहा कि एजेंसियों पर कॉमर्शियल गैस सिलिंडर उपलब्ध नहीं हैं, जिससे कारोबार बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।गैस की कमी के चलते शहर की कई दुकानों पर समोसे बनना बंद हो गया है। इस बीच पूर्ति विभाग ने शिकायतों के बाद सख्ती दिखाते हुए होटलों और रेस्टोरेंट्स पर छापेमार कार्रवाई शुरू कर दी है। जांच के दौरान कई व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में घरेलू गैस सिलिंडरों का अवैध उपयोग पकड़ा गया। होटल एवं रेस्टोरेंट एसोसिएशन के महामंत्री विपुल सिंघल ने बताया कि गैस की कमी के कारण कचौरी और टिक्की की कई छोटी-बड़ी दुकानें बंद हो गई हैं। कई ढाबे अब पारंपरिक तंदूर के सहारे काम चला रहे हैं, जबकि बड़े होटलों ने भी गैस तंदूर छोड़कर कोयले वाले तंदूर का इस्तेमाल शुरू कर दिया है।

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