प्रयागराज में मुकद्दस माहे रमजान के 30 रोजे पूरे हो चुके हैं और ईद का चांद भी नजर आ गया है। हालांकि, इस बार मुस्लिम समाज में वैसी रौनक और उत्साह नजर नहीं आ रहा है। ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष तथा उसमें बेगुनाह बच्चों व मासूमों की शहादत से आहत होकर मुस्लिम समाज ने इस साल ईद को ‘सादगी और शोक’ के साथ मनाने का फैसला लिया है। आल इंडिया शिया काउंसिल और देश भर के अहले सुन्नत जमात के बड़े उलेमाओं ने कौम से अपील की है। उम्मुल बनीन सोसायटी के महासचिव सैय्यद मोहम्मद अस्करी ने बताया कि इस बार ईद की खुशियों से दूरी बनाई गई है। अकीदतमंद नए कपड़ों की जगह पुराने वस्त्रों में ही ईद-उल-फितर की नमाज अदा करेंगे। जुल्म के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के लिए नमाज के दौरान बाहों पर ‘काली पट्टी’ भी बांधी जाएगी। इस फैसले का असर घरों के भीतर भी दिखेगा। मुस्लिम महिलाओं ने भी एकजुटता दिखाते हुए निर्णय लिया है कि वे इस बार न तो नए वस्त्र पहनेंगी, न ही चूड़ियां या किसी प्रकार का श्रृंगार करेंगी। समाज का कहना है कि जब दुनिया के एक हिस्से में इंसानियत लहूलुहान हो, तो जश्न मनाना उचित नहीं है। रमजान के आखिरी जुमे और तीस रोजे पूरे होने पर मस्जिदों में अकीदतमंदों का सैलाब उमड़ा। नमाज के बाद बारगाहे इलाही में हाथ फैलाकर विशेष दुआएं मांगी गईं। इनमें हिंदुस्तान को बुरी नजर और दुश्मनों के शर से महफूज रखने की कामना की गई। कारोबार में तरक्की, बीमारियों से निजात और बेरोजगारों को रोजगार के लिए भी गुहार लगाई गई। दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए भी सजदा किया गया। सैय्यद मोहम्मद अस्करी के मुताबिक, शहर की शिया व सुन्नी जामा मस्जिदों, ईदगाहों और छोटी-बड़ी मस्जिदों में नमाज पूर्व निर्धारित समय पर ही होगी। हालांकि, इस बार ईद मिलन के पारंपरिक जश्न की जगह केवल सादगी और भाईचारे का संदेश दिया जाएगा।

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