मुजफ्फरनगर में स्मार्ट प्रीपेड बिजली मीटरों को लेकर बहस तेज हो गई है। विद्युत विभाग इसे आधुनिक और पारदर्शी व्यवस्था बता रहा है, वहीं किसान संगठन इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती मान रहे हैं। दिल्ली-देहरादून हाईवे स्थित कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में मुख्य अभियंता विनोद कुमार ने स्मार्ट प्रीपेड मीटर के कई फायदे गिनाए। उन्होंने बताया कि इस प्रणाली से उपभोक्ता अपने बिजली उपयोग की जानकारी वास्तविक समय में प्राप्त कर सकेंगे। समय पर रिचार्ज करने पर बिजली बिल में छूट मिलेगी और बैलेंस समाप्त होने के बाद भी कुछ समय तक बिजली आपूर्ति जारी रहेगी। विभाग के अनुसार, यह योजना आरडीएसएस (Revamped Distribution Sector Scheme) के तहत लागू की जा रही है, जिसके अंतर्गत पुराने मीटरों को हटाकर स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए जा रहे हैं। अधिकारियों का दावा है कि इससे बिजली वितरण प्रणाली अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनेगी। किसानों को गन्ने का भुगतान भी कई महीनों बाद मिलता है हालांकि, इस योजना को लेकर विरोध के स्वर भी मुखर होने लगे हैं। भारतीय किसान यूनियन (अराजनीतिक) के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने स्मार्ट मीटर व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि विभाग केवल फायदे गिना रहा है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में इसका विरोध हो रहा है। मलिक ने आरोप लगाया कि जिन कंपनियों द्वारा स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं, वे पहले ही उत्तर प्रदेश में ब्लैकलिस्ट हो चुकी हैं। उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि गांवों में अधिकांश लेन-देन उधारी पर चलता है। किसान नेता के अनुसार, किसानों को गन्ने का भुगतान भी कई महीनों बाद मिलता है। लगातार नए-नए सिस्टम लागू किए जा रहे ऐसे में प्रीपेड सिस्टम में पहले से पैसा जमा कराना ग्रामीणों के लिए मुश्किल साबित होगा। उन्होंने यह भी कहा कि पहले जहां उपभोक्ता तीन-तीन महीने बाद बिजली बिल जमा करते थे, वहीं अब बैलेंस खत्म होते ही कनेक्शन कटने का डर बना रहेगा। धर्मेंद्र मलिक ने सरकार से सवाल किया कि पहले से लगे मीटरों में आखिर क्या कमी थी, जो लगातार नए-नए सिस्टम लागू किए जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि स्मार्ट मीटर के जरिए रीडिंग के नाम पर उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला जा रहा है। फिलहाल, जिले में स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने का कार्य तेजी से जारी है, लेकिन इसके साथ ही विरोध और आशंकाएं भी बढ़ती नजर आ रही हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार और विभाग इन सवालों का क्या समाधान निकालते हैं।

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