आगरा की महापौर हेमलता दिवाकर कुशवाह ने शनिवार को लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की। जहां उन्होंने नगरायुक्त अंकित खंडेलवाल पर नगर निगम अधिनियम के उल्लंघन और लगभग 9 करोड़ रुपये की गड़बड़ी के आरोप लगाए है। इसकी उन्होंने मुख्यमंत्री से जांच कराने की मांग की है। महापौर ने मुख्यमंत्री से कहा-नगरायुक्त द्वारा ई-टेंडरिंग की उपेक्षा कर ऑफलाइन बॉक्स प्रणाली के माध्यम से लगभग 9 करोड़ रुपये की गड़बड़ी की गई है और ठेकों में मॉनोपॉली स्थापित की गई है। उन्होंने कहा कि धारा 117 (6) का नियम विरुद्ध प्रयोग किया गया है और इसकी सूचना नगर निगम की कार्यकारिणी समिति को भी उपलब्ध नहीं कराई गई है। महापौर ने कहा कि ई-टेंडरिंग की उपेक्षा करके लगभग 40 से 50 करोड़ के कार्य ऑफलाइन बॉक्स प्रणाली से कराए गए हैं, जिनमें अधिकतम 5 प्रतिशत निम्न दरें प्राप्त हुई हैं। इस सुनियोजित प्रक्रिया से नगर निगम को अनुमानतः 9 करोड़ रुपये की प्रत्यक्ष आर्थिक क्षति पहुंची है। पत्र लिखने के बाद भी नहीं दिया कोई विवरण
महापौर ने मुख्यमंत्री से कहा कि धारा 117 (6) का नियम विरूध्द प्रयोग नगर निगम अधिनियम 1959 की धारा 117-6बी के अन्तर्गत प्रदत्त विशेषाधिकार केवल “अपरिहार्य आकस्मिकता” हेतु हैं। संज्ञान में आया है कि लेकिन नगरायुक्त द्वारा इस धारा का प्रयोग सामान्य प्रक्रिया के रूप में किया गया है और इसकी सूचना नगर निगम की कार्यकारिणी समिति को भी उपलब्ध नहीं करायी गयी। इसके लिए नगरायुक्त को बार-बार निर्देशित किया गया। इसके उपरान्त भी नगरायुक्त अपनी मनमानी के चलते हुए कोई विवरण प्रस्तुत नहीं किया गया। जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र की समस्या से भी कराया अवगत महापौर ने मुख्यमंत्री को बताया-शहर के नागरिकों को जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र बनवाने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। नियमानुसार 21 दिन की समयावधि के बाद जांच कराने एवं आदेश जारी करने का अधिकार उप जिलाधिकारी में निहित किया गया है, लेकिन उप जिलाधिकारी स्तर से जांच कराने और जांच के बाद सक्षम आदेश पारित करने में नियमावली में दिए गए समय से अधिक समय लग रहा है। आमजन को तीन से चार महीने तक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। वर्तमान प्रक्रिया में जटिलता समाप्त करने की आवश्यकता है और पूर्व व्यवस्था में नगर निगमों में उप निबन्धक (जन्म-मृत्यु) को एक महीने की अवधि तक बिना शपथ पत्र के लिए रजिस्ट्रेशन करने और एक वर्ष की अवधि के अंदर शपथ पत्र के माध्यम से रजिस्ट्रेशन का अधिकार था। महापौर ने सुझाव दिया कि नगर निगम में एक पीसी में पी०सी०एस० अधिकारी की तैनाती रहती है, जिनको एक वर्ष तक की अवधि प्रकरणों के निस्तारण के लिए अधिकृत किया जा सकता है और एक वर्ष से अधिक समय होने पर जिलाधिकारी के अधीन किसी भी अपर नगर मजिस्ट्रेट को जन्म-मृत्यु के प्रकरणों को सुनने, निर्णय किए जाने का अधिकार दिया जा सकता है।

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