विकास क्षेत्र विक्रमजोत के रमहटिया में चल रही संगीतमयी कथा में वेदव्यास जी महाराज ने माया की प्रबलता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भगवान की अहलादिनी शक्ति ही माया है, जो अत्यंत बलवान है। माया ही जीव के बंधन और मुक्ति का मूल कारण है। कथावाचक ने समझाया कि भक्ति मार्ग पर चलते हुए जब साधक के भीतर ‘अहं’ का भाव जागृत होता है, तभी माया अपना कार्य शुरू कर देती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण नारद जी के जीवन प्रसंग में मिलता है। वेदव्यास जी को स्वयं नारद जी ने बताया था कि कैसे ब्रह्मज्ञानी और भक्त शिरोमणि होने के बावजूद वे एक स्त्री रूपी माया के जाल में फंसकर उसके पीछे-पीछे डोलने लगे थे। इसी प्रसंग में पर्वत मुनि का भी उल्लेख किया गया, जिन्होंने माया के प्रभाव से दमयंती से विवाह कर लिया था। वेदव्यास जी ने स्पष्ट किया कि व्यक्ति के जीवन में माया का महत्वपूर्ण स्थान है। यह व्यक्ति को मोह में डालकर बड़े-बड़े संघर्ष (महाभारत) करा सकती है, वहीं भ्रमजाल से मुक्त कर वैराग्य भी उत्पन्न कर सकती है। उन्होंने बताया कि जो वस्तुएं हमें संसार में बांधे रखती हैं और हमारे बंधन का कारण बनती हैं, वे सभी माया कहलाती हैं। केवल धन ही माया नहीं है, बल्कि वे सभी चीजें जिनके प्रति हम आसक्त होकर काम, क्रोध आदि विकारों में लिप्त रहते हैं, वे भी माया ही हैं। वेदव्यास जी ने इस आम धारणा को भी स्पष्ट किया कि माया खराब है। उन्होंने कहा कि असलियत में माया खराब नहीं होती, वह तो सुविधा के लिए बनी है। हमारी आसक्ति ही खराब है। हम आसक्ति को छोड़ना नहीं चाहते और बहाना करते हैं कि माया छूटती नहीं। उन्होंने कंबल के उदाहरण से समझाया कि जैसे व्यक्ति कंबल को नहीं छोड़ना चाहता और कहता है कि कंबल उसे नहीं छोड़ रहा, वैसे ही हम माया को नहीं छोड़ते और कहते हैं कि माया ने हमें फंसाया है। इस अवसर पर आयोजक सर्वेश प्रताप सिंह रोहित, सुरेंद्र सिंह, राहुल सिंह शिवम, अभय, उदयनारायण, भूपेंद्र सिंह, सिम्पी, रूबी, काजल, पूजा, रुद्रांशी, दिव्यांशी सहित क्षेत्र व जिले भर से आए श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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